अपनी मौत के बाद के हालात से परेशान होना |


अपनी मौत के बाद के हालात से परेशान होना
अपनी मौत के बाद के हालात से परेशान होना
  हदीस

अन मुहम्मद बिन इस्माईल अन अबीहि क़ालः “ कुन्तु इन्दा अबि अब्दिल्लाह (अ.) इज़ा दख़लः अलैहि अबु बसीर फ़क़ालः या अबा मुहम्मद लक़द ज़कर कुमुल्लाह फ़ी किताबिहि फ़क़ालः “इन्ना इबादी लैसः लकः अलैहिम लिसुलतान।”[1]वल्लाहु मा अरादः इल्लल आइम्मह (अ.) व शियतिहिम फ़हल सररतुक या अबा मुहम्मद ? क़ालः क़ुल्तु जअलतु फ़िदाक ज़दनी....।[2] ”
तर्जमा

अबु बसीर इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की मजलिस में हाज़िर हुए बैठ कर तेज़ तेज़ साँस लेने लगे, इमाम ने उनकी तरफ़ देखा और फ़रमाया क्या कुछ परेशानी है ? अबु बसीर ने अर्ज़ किया मैं बूढ़ा और कमज़ोर हो गया हूँ, अब मेरे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया है, मौत के दर्वाज़े पर खड़ा हूँ, लेकिन इन सब से बढ़ कर यह है कि मैं अपनी मौत के बाद के हालात से परेशान हूँ नही जानता कि मेरी तक़दीर में क्या है ? इमाम ने फ़रमाया कि तुम ऐसी बातें क्यों कर रहे हो तुम तो शियों का इफ़्तेख़ार हो ? इसके बाद इमाम ने शियों के फ़ज़ाइल बयान फ़रमाये और इमाम हर फ़सल बयान फ़रमाने के बाद पूछते थे कि क्या तुम इस मतलब से खुश हुए और अबु बसीर कहते थे कि जी मैं आप पर फ़िदा मेरे लिए और बयान फ़रमाये....।

आख़िर में इमाम ने फ़रमाया ऐ अबु बसीर अल्लाह ने क़ुरआन में तुम शियों की तरफ़ इशारा किया है और फ़रमाया है कि शैतान मेरे बन्दों पर तसल्लुत क़ाइम नही कर सकता। और अल्लाह की क़सम यहाँ पर बन्दों से अल्लाह की मुराद आइम्मा और उनके शिया है उनके अलावा और कोई नही है।

हदीस की शरह

शैतान के बारे में चन्द सवालात हैं, जो अक्सर जवानों की तरफ से किये जाते हैं ज़रूरी है कि हम इनके बारे में छान बीन करें।

सवाल- अल्लाह ने अग़वा करने वाले ख़बीस वजूद शैतान को क्यों पैदा किया जो हमारे अन्दर वसवसे पैदा करता है और हमको नेकी के रास्ते से रोकता है ? जबकि हम नेकी के रास्ते तय करने के लिए पैदा किये गये है ?

जवाब-अल्लाह ने शैतान को शैतान पैदा नही किया बल्कि उसको पाक पैदा किया था और वह फ़रिश्तो की सफ़ों में था। वह बुरा नही बल्कि एक नेक वजूद था जो आबिदों और ज़ाहिदों का एक जुज़ और अल्लाह की बारगाह का मुक़र्रब था। मगर बाद में अपने इख़्तियार से मुनहरिफ़ हो गया। तकब्बुर, खुद पसंदी, हसद, नफ़्स परस्ती और जाहो जलाल का लालच उसकी तनज़्ज़ुली का सबब बने। हवाए नफ़्स असली आमिल है अगर यह न हो तो शैतान का नफ़ूज़ भी नहो। अबा व अस्तकबरा व काना मिनल काफ़िरीन[3] अल्लाह ने उसको इन तमाम मुक़ामात से नीचे उतारा। बस शैतान शुरू से ही शैतान नही था।
इशकाल- अगर शैतान फ़रिशतों में से था तो फ़रिश्ते तो अपने ऊपर कोई इख़्तियार नही रखते और सबके सब अल्लाह के ज़ेरे फ़रमान हैं बस उसने किस तरह अल्लाह की नाफ़रमानी की ?

जवाब- शैतान फ़रिश्ता ही नही था कि इख़्तियार न रखता हो वह तो एक जिन्न था।

सवाल- हम नेकी व सआदत के लिए पैदा किये गये हैं मा ख़लक़तुल जिन्ना वल इन्सा इल्ला लियअबुदून बस यह ज़हमत देने वाला शैतान का वजूद किस लिए है वह भी ऐसी चीज़ जो न दिखाई देती हो, न ही उससे अपना दिफ़ाअ किया जा सकता है और न ही उस पर क़ाबू पाया जा सकता है। यह तो ख़िलक़त के मक़सद से साज़गार नही है ?

जवाब- क़ुरआन का बयान है कि शैतान तुम्हारे इख़्तियार के बग़ैर तुम्हारे अन्दर नफ़ूज़ पैदा नही करता। तुम्हारे दिलों के दरवाज़े उसके लिए बन्द हैं। तुम ख़ुद दरवाज़ों को खोलते हो। वाक़ियत यह है कि कोई भी ख़बीस वजूद इंसान के तनो रूह में दाख़िल नही हो सकता। इन्नमा सुलतानुहु अलल लज़ीना यतवल्लूनहु वल लज़ीना हुम.....

वह लोग जो उसको अल्लाह का शरीक क़रार देते हैं और उसकी इताअत करते हैं क़ियामत के दिन शैतान उनसे कहेगा कि“ व मा काना लि अलैकुम मिन सुलतानिन इल्ला अन दावताकुम फ़सतजिबतुम फ़ला तुलुमूननी वलूमू अनफ़ुसाकुम” यानी मैं तुम्हारे ऊपर मुसल्लत नही हूँ मैंने फ़क़त तुम्हे दावत दी और तुमने मेरी दावत को क़बूल किया बस मुझे मलामत न करो बल्कि खुद अपने नफ़्सों को मलामत करो।

यह बात भी क़ाबिले ज़िक्र है कि जो लोग तकामुल की मंज़िल में हैं उनके लिए ख़ुद शैतान तकामुल का सबब है। क्योंकि उससे टकराना और उससे मुक़ाबला करना ईमान के पुख़ता होने का सबब बनता है। मशहूर मग़रबी तारीख़दाँ टी. एन. बी. अपनी किताब “फ़लसफ़ा ए तरीख़” में लिखता है कि “मैने इस दुनिया में वजूद में आने वाले तमाम तमद्दुनों पर ग़ौर किया तो पाया कि हर तमद्दुन ताक़तवर दुश्मन के हमले का निशाना बना और फिर उसने अपनी पूरी ताक़त से दिफ़ा करके अपने फूलने फलाने की राह हमवार की।”बस तरह शैतान के वजूद में भी हिकमत है जैसे अगर हवाए नफ़्स न होती तो आरिफ़ान क़वी न बनते।

क़ुरआन कहता है कि “ इन्ना इबादी लैसा लका अलैहिम सुलतान”

इस आयत का मतलब यह नही है कि शैतान शियों से नही टकराता बल्कि अल्लाह यह फ़रमा रहा है कि मैं उनका हामी और मददगार हूँ वह मेरी तरफ़ आये और मेरे बन्दे हो गये तो मैं भी उनका हामी हूँ। बस यह बलन्द मर्तबा है और शैतान के नफ़ूज़ से बाहर होना शियों का इफ़्तख़ार है। लेकिन इस का मफ़हूम यह है कि जिन पर शैतान अपना तसल्लुत जमा लेता है वह वाक़ई शिया नही है। बस यह जुम्ला हमारी ज़िम्मेदारियों का बढ़ाता है। शिया मासूम नही हैं और यह भी मुमकिन है कि शैतान उनको बहकाने के लिए आये। लेकिन क़ुरआन कहता है कि

“इन्नल लज़ीनाइत्तक़व इज़ा मस्साहुम ताइफ़ुन मिन अश्शैतानि तज़क्करू फ़इज़ा हुम मुबसिरून।”[4] पुरेहज़गार लोगों को जब कोई शैतानी वसवसा छू जाता है तो वह अल्लाह को याद करते हैं (उसके इनाम और सज़ा को याद करते हैं) और उसकी याद के परतव मे हक़ाइक़ को देखने लगते हैं। यह भी मुमकिन है कि शैतान आये मगर तसल्लुत न जमा सके। लिहाज़ा जिम्मेदारी बहुत ज़्यादा है लिहाज़ा यह चाहिए कि इस्लामी समाज में किसी फर्द, समाज, मतबूआत, बाज़ार और माद्दी व मानवी जिन्दगी पर शैतान का तसल्लुत न हो। और अगर शैतान का तसल्लुत हो गया तो वह अफ़राद वाक़ई शिया नही हैं। उम्मीदवार हूँ कि अल्लाह हमको तौफ़ीक़ दे ताकि शियत का इफ़्तख़ार हमारे भी शामिले हाल हो जाये।

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[1] सूरए फ़ज्र आयत न. 42

[2] बिहारुल अनवार जिल्द 65/51

[3] सूरए बक़रः आयत न. 34

[4] सूरए आराफ़ आयत न. 201