मुसीबत के पहाड़ |


मुसीबत के पहाड़
मुसीबत के पहाड़
  हज़रत ख़दीजा (स) की रेहलत का जानलेवा वाक़ेया इतना सख़्त था कि मुसलमान पैग़म्बर (स) की सलामती के बारे में फ़िक्र मंद हो गये। सारे मुसलमान पैकरे

सब्र व इस्तेक़ामत को इस वाक़ेया के बारे में तसल्ली देने की कोशिश कर रहे थे।

हकीम बिन हेज़ाम की बेटी हौला ने जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) को तसलीयत पेश की तो आपने जवाब में फ़रमाया:

ख़दीजा (स) मेरे लिये माय ए सुकून थीं, वह मेरी औलाद की माँ और मेरे ख़ानदान की सर परस्त थीं। सब से बड़ा आमिल जो इस मुसीबत में

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सब्र व इस्तेक़ामत के सामने हायल था वह हज़रत ख़दीजा (स) की यादगार, ग़मों और मुसीबतों से भरा हज़रत ज़हरा (स) का चेहरा था,

आप अश्कबार आँखों से अर्ज़ कर रही थीं बाबा, मेरी माँ कहाँ है? बाबा, मेरी माँ कहाँ हैं? यहाँ तक क़ासिदे वही नाज़िल हुआ और कहने लगा:

फ़ातेमा से कह दीजिये कि ख़ुदा वंदे आलम ने तुम्हारी माँ ख़दीजा (स) के लिये जन्नत में ऐसा महल तैयार किया है जिस में किसी क़िस्म का रंज व ग़म न होगा।

चूँ कि हज़रत ख़दीजा (स) की रेहलत हज़रत अबू तालिब (अ) की ग़म अंग़ेज़ रेहलत के कुछ अरसे बाद वाक़े हुई लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) ने

इस साल को आमुल हुज़्न (ग़म व अंदोह का साल) का नाम दिया। गोया हक़ीक़त में एक साल अज़ा ए उमूमी का ऐलान किया।

पैग़म्बरे अकरम (स) फ़रमाया करते थे कि जब तक अबू तालिब (अ) व ख़दीजा (स) ज़िन्दा थे

तो मुझ पर कभी भी ग़म व अंदोह तारी व हुआ। पैग़म्बरे अकरम (स) जनाबे ख़दीजा (स) के साथ मुशतरेका ज़िन्दगी के तल्ख़ व शीरीं लम्हात कभी न भूले।

यहाँ तक कि जब घर से निकलते थे तो हज़रत खदीजा (स) को याद करते थे।

जिस के नतीजे में कभी कभी अपनी बक़िया अज़वाज के लिये पैग़म्बर (स) का यह तरीक़ा रश्क व हसद का सबब बन जाता था और ऐतेराज़ात का अंबार लग जाता था

लेकिन आप तहे दिल से हज़रत खदीजा (स) की हिमायत करते हुए फ़रमाते थे: हाँ, ख़दीजा (स) ऐसी ही थीं और ख़ुदा वंदे आलम ने मेरी नस्ल की बक़ा का ज़रिया उन्हे बनाया है।

जब कभी पैग़म्बर (स) के घर भेड़, बकरी ज़िब्ह की जाती थी तो हज़रत ख़दीजा (स) के चाहने वालों में ज़रुर तक़सीम करते थे।