हज़रत खदीजा (स) की अक़्ल व ज़िहानत |


हज़रत खदीजा (स) की अक़्ल व ज़िहानत
हज़रत खदीजा (स) की अक़्ल व ज़िहानत
  हज़रत खदीजा (स) की फिक्रे सालिम व अक़्लमंदी के बारे में सिर्फ़ इतना ही काफ़ी है कि मुवर्रेख़ीन ने लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने तमाम उमूर में हज़रत ख़दीजा (स) से मशविरा करते थे। हज़रत ख़दीजा (स) ब उनवाने मुशाविरे पैग़म्बर (स) ज़िन्दगी की तमाम मुश्किलात में पैग़म्बर (स) के साथ रहें और ज़िन्दगी के नागवार हवादिस में आपको तसल्ली बख़्शती थीं, इस्लाम की दावत के दौरान आपकी ज़िन्दगी में जो मुश्किलात और मशक़्क़तें पेश आ रही थीं। हज़रत खदीजा (स) ने आप की ख़ातिर उन्हे तहम्मुल किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) चाहते थे कि क़ुरैश इस्लाम को तसलीम कर लें और ख़ुदा वंदे आलम के ग़ज़ब से महफ़ूज़ हो जायें लेकिन जब उनकी दुश्मनी और हट धर्मी का मुशाहिदा करते थे तो आप के क़ल्ब पर ग़म व अंदोह तारी हो जाता था ऐसी हालत में जब घर तशरीफ़ लाते थे और अपने दिल का राज़ हज़रत ख़दीजा (स) से बयान करते थे तो हज़रत ख़दीजा (स) अपनी हकीमाना बातों और आराम बख़्श निगाहों से आप के दिल को तसकीन पहुचाती थीं। शेअबे अबी तालिब (अ) में माली व इक़्तेसादी मुहासरे में सख़्ती व मशक़्क़त से ज़िन्दगी बसर करने में हज़रत ख़दीजा (स) का माल था जिसने उस इक़्तेसादी मुहासरे को तोड़ा, उस दौरान ग़म व अंदोह से मुक़ाबिला करने में आप का बहुत हिस्सा रहा है। अगरचे ख़ुदा वंदे आलम अपनी बे पायाँ इनायात के साथ पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हिफ़ाज़त कर रहा था लेकिन हज़रत खदीजा (स) ने अपने शादाब चेहरे और निशात बख़्श निगाहों के ज़रिये आप की ज़िन्दगी के सख़्त लम्हात में आप के इरादे को पुख़्ता करने में नुमायाँ किरदार अदा किया है।