ग़दीर और इस्लामी उख़ुव्वत | एजाज़ मुसावी


ग़दीर और इस्लामी उख़ुव्वत
ग़दीर और इस्लामी उख़ुव्वत
  एजाज़ मुसावी




क्या ग़दीर के साथ इत्तेहादे इस्लामी मुम्किन है?


ग़दीर या उस से मुतअल्लिक़ हदीस या वाक़ेयात पर तबसेरा या तज़किरा बाज़ हज़रात को मनाफ़ी ए इत्तेहाद नज़र आता है। बहुत से ज़ेहनों में यह बात भी आती होगी कि ग़दीर के ज़िक्र के साथ यह इत्तेहाद, जो हम मुख़्तलिफ़ इस्लामी फ़िरक़ों में वुजूद में लाना चाहते हैं, कैसे मुम्किन हो सकता है? इसलिये कि ग़दीर का नाम लेते ही फिक्र बाज़ जेहात व जवानिब की जानिब मुतमर्किज़ हो जाती है जिसके बाद या जिस से हट कर गुफ़तुगू मुम्किन नही रहती।

क्या वाक़ेयन ऐसा है? नही ऐसा नही है और अगर फ़र्ज़ कर लें कि ऐसा हो भी तो जो लोग इस तरह के ऐतेराज़ात करते हैं अस्ल में वह इत्तेहाद के मफ़हूम और मअना से कमा हक़्क़हू आशना नही है।

इत्तेहाद का मक़सद और हदफ़ इस्लामी फ़िरक़ों के दरमियान मुशतरक अक़ायद व मसायल पर हमफ़िक्री व हमआहंगी पैदा करना है न कि एक दूसरे के ऊपर अपने फ़िरक़े के मख़सूस अक़ायद व अहकाम का थोपना।

इत्तेहाद का मतलब यह हरगिज़ नही है कि शिया इत्तेहाद की दावत दे कर सुन्नियों को अपना हम मसलक व हम अक़ीदा बनाना चाहते हैं या अगर सुन्नी इत्तेहाद की राह में क़दम बढ़ा रहे हैं तो इस का मतलब यह है कि वह शियों को मज़हबे अहले सुन्नत में शामिल करना चाहते हैं।

इत्तेहाद, इस्लामी उम्मतों के मुशतरेका अक़ायद व अहकाम व मसायल के ज़रिये उन्हे एक प्लेटफ़ार्म पर जमा करने का नाम है। तमाम मसालिक व मज़ाहिब एक दूसरे के मुशतरक मसायल का मुतालआ करें ता कि उससे आगे के मराहिल के सिलसिले में एक दूसरे के साथ मुफ़ाहेमत पैदा करने के लिये बैठ सकें। एक दूसरे के मुशतरेकात तो जानने और समझने के बाद दिलों में नर्मी पैदा होने का इमकान है। एक दूसरे के मसालिक व मज़ाहिब के ग़ायर मुतालआ से उन्हे उन के नज़रियात, उन के दलायल को समझने में आसानी होगी। जब यह इल्मी व तहज़ीबी व सक़ाफ़ती फ़ज़ा हमवार हो जायेगी तो नफ़रत व दिल आज़ारी में कमी होना तबीई अम्र क़रार पायेगा। मसलन उम्मते इस्लामिया शियों पर इल्ज़ाम लगाती है कि यह लोग मुतआ के नाम पर ज़ेना करते हैं। तक़य्या के नाम पर झूठ बोलते हैं। मिट्टी को सजदा करते हैं। क़ब्रों पर नमाज़ पढ़ते हैं। क़ब्रों का पक्की और सोने चाँदी की बनाते हैं। हज़रत अली (अ) की नबुव्वत के क़ायल है। जिबरईल ने नबुव्वत (मआज़ल्लाह) मौला ए कायनात हज़रत अली (अ) को देने के बजाए पैग़म्बरे इस्लाम (स) को दे दी...........।

इस तरह के ढ़ेरों इल्ज़ामात और इत्तेहामात हैं जो शियों पर लगाए जाते हैं बल्कि नही सिर्फ़ शियों पर नही, यह और इस तरह के इल्ज़ामात हर फ़िरक़ा दूसरे फ़िरक़े पर लगाता है। बाज़ औक़ात तो नौबत इल्ज़ाम की मंज़िल से आगे निकल कर क़त्ल व ग़ारत गरी तक पहुच जाती है। अकसर व बेशतर एक फ़िरक़ा दूसरे फ़िरक़े पर कुफ़्र व इलहाद के फ़तवे लगाने से भी नही चूकता। आज हालत यह है कि सारे मुसलमान एक अल्लाह को मानने, एक रसूल की रिसालत की गवाही देने, एक क़िबले की तरफ़ सजदा करने, एक किताब को मानने को मानने और उस पर अमल करने के बावजूद एक दूसरे पर कुफ़्र का फ़तवा लगाते हैं। इस्लामी तालीमात के बर ख़िलाफ़ एक दूसरे से सुए ज़न करते हैं, भाईचारगी और उख़ुव्वत का इज़हार करने के बजाए नफ़रत व किनह का इज़हार करते हैं। एक साथ ऐसे बैठते हैं जैसे मुसलमान भाई के साथ नही किसी काफ़िर व मुनाफ़िक़ के साथ बैठे हैं। दिलों में बुग़्ज़ रखना आम है। गुफ़तुगू और अमल में सूए ज़न करना मामूली बात है।

इल्ज़ाम तराशी और दिल आज़ारी गुनाह तसव्वुर नही किया जाता। एक दूसरे के बुज़ुर्गान की तौहीन पर ख़ुश होते हैं। अगर एक किसी की तौहीन करे तो जवाब में दूसरा तौहीन करना अपना फ़र्ज़ समझता है।

क्या यही इस्लामी तालीमात थीं जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने साथ लेकर आये थे? क्या यही इस्लाम था जिस ने दुनिया में इंक़ेलाब बरपा कर दिया था? क्या यही इस्लाम था जिसने सियाह व सफ़ेद को एक दूसरे का अज़ीज़, एक दूसरे का भाई बना दिया था? क्या यही इस्लाम था जो हज़रत जिबरईल (अ) लेकर आये थे? क्या यही इस्लाम था जिसने लोगों के दिलों को मुसख़्ख़र कर लिया करता था? क्या यही वह इस्लाम था जिसने आला व अदना, अमीर व ग़रीब, अरबी व अजमी के फ़र्क़ को ख़त्म कर दिया था? क्या यही इस्लाम था जिस की तरवीज की ख़ातिर पैग़म्बरे अकरम (स) ने तमाम ज़हमतों और मुश्किलों को तहम्मुल किया था? क्या यही वह इस्लाम था जिस की ख़ातिर मौला ए कायनात हज़रत अली (अ) ने अपने ऊपर होने वाले मज़ालिम पर सब्र कर लिया और उसकी राह में अपने मफ़ाद को क़ुर्बान कर दिया और अपने हक़ से दस्तबरदार हो गये? अपने दिल को ख़ून करना गवारा कर लिया मगर आह न की व...........................।

ख़ुलासा यह कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) और मौला ए कायनात (अ) ने जिस इस्लाम के लिये ज़हमते उठाईं, जिसे परवान चढ़ाया, जिस के लिये अपने हुक़ूक़ की क़ुर्बनी दी, आज हमें उसकी अज़मते रफ़ता के लिये कोशिशें करनी हैं और उसके लिये राह हमवार करनी है ता कि एक बार फिर अस्ल इस्लाम की तस्वीर दुनिया के सामने आ सके।

ग़दीर, उन मिन जुमला बहसों में से एक है जो मुख़्तलिफ़ इस्लामी मज़ाहिब के दरमियान हमेशा मौज़ू ए सुख़न रहा है। इत्तेहाद के ज़ुमरे में और उसके तहक़्क़ुक़ की राह में दो बातों का लिहाज़ करना निहायत ज़रुरी और ना गुज़ीर है। उन में से कोई भी किसी दूसरे की भेंट नही चढ़ना चाहिये। एक तो हिफ़्ज़े इत्तेहाद व उख़ुव्वते उम्मते इस्लामी, दूसरे हिफ़्ज़ अस्ले इस्लाम।

यक़ीनन तमाम मुसलमानों का फ़रीज़ा है कि दीने इस्लाम की हिफ़ाज़त करें, उसको फ़रोग़ दें, उसके फ़रोग़ देने की राह में हमारे दोश पर भारी ज़िम्मेदारियाँ आयद होती हैं। यह बात भी पेशे नज़र होनी चाहिये कि मुसलमानों के दुश्मन मुशतरक हैं और उन सब का हदफ़ अस्ले इस्लाम को सफ़ह ए हस्ती से मिटाना है। लिहाज़ा हमें मुत्तहिद हो कर इस्लाम व उम्मते इस्लामी का दिफ़ाअ करना चाहिये लेकिन इसका मतलब यह नही है कि हम अपने दूसरे अहम फ़रायज़ को नज़र अंदाज़ कर दें या उन मसायल को ग़ैर ज़रुरी बना कर इत्तेहाद को अस्ल बना कर उस पर क़ुर्बान कर दें।

ग़दीर की अस्ल व असास और उसके वाक़ेया को मुसलमानों के ज़ेहनों में ज़िन्दा करके, उन्हे उससे आगाह करके हम एक फ़रीज ए मज़हबी की अदायगी से सर फ़ऱाज़ हो सकते हैं। अवामुन नास तक ग़दीर को पहुचा कर हम बड़ी ख़िदमत अंजाम दे सकते हैं। उम्मते इस्लामी में एक कसीर तादाद ऐसी है जिसे या ग़दीर का इल्म नही है या यह इल्म इतना कम रंग हैं कि उसकी वाक़ई व हक़ीक़ी तस्वीर उभर कर सामने नही आ पाती। यह बात सबब बनती है कि वह इस की तरफ़ मुतवज्जे न हों और न ही किसी रग़बत का इज़हार करें। जिस के नतीजे में वह दूरी जो सदियों से हायल है उसका सिलसिला दवाम पैदा करता रहता है और जो लोग ग़दीर से वाक़िफ़ है, हदीसे ग़दीर या वाक़य ए ग़दीर का मुतालआ कर चुके हैं उन्हे इस सिलसिले की ग़लत बयानियाँ, ग़लत तावीलात, ग़लत तफ़सीर हक़ीक़त से मुनहरिफ़ कर देती है। हमारा फ़रीज़ा यह है कि हम उनके उन शुबहात को दूर करें, उनके इंहेराफ़ के रुख़ को मोड़ें और उन्हे ख़ालिस और अस्ल ग़दीर का मंज़र दिखायें। उसके सेयाक़ व सबाक़ और उसके अतराफ़ व जवानिब से आगाही दिलों को ज़िन्दा करने, उनमें उम्मीद की तजल्ली रौशन करने और अपने दीन व मज़हब की तरफ़ राग़िब होने की सलाहियत बेदार कर सकती है।

ग़दीर की तस्वीर, ग़दीर का तसव्वुर, ग़दीर की अमलियाती व तज्ज़ियाती फ़िक्र, तशय्यो की हक़्क़ानियत का सबूत पेश कर सकती है।

ग़दीर पर तवज्जो, ग़दीर का मुतालआ और ग़दीर को इत्तेहाद का मौज़ू बना कर, हम ग़दीर के लिये निहायत ख़िदमत अंजाम दे सकते हैं। ग़दीर के साथ इत्तेहाद का मतलब यह है कि हम उन्हे ग़दीर के मौज़ू पर साथ मिल कर काम करने की दावत दें, उन्हे ग़दीर के मनाबेअ की तरफ़ तशवीक़ करें, उससे आगाह करें, उस पर उनके अपने नुक़्ताहाए नज़रात को बयान करने को कहें और शिया नुक़्तहाए नज़र को उन के सामने पेश करें।

और ज़ाहिर है कि यह इत्तेहाद तब ही मुमकिन हो सकता है जब हम तास्सुब की ऐनक उतार कर दिलों में इस्लामी उख़ुव्वत का चिराग़ रौशन करके, इस्लाम को दुश्मन की साज़िशों से महफ़ूज़ रखने के लिये नर्म दिल और खुले ज़ेहन के साथ मिल जुल कर एक साथ क़दम उठायें।

मुमकिन है यहाँ पर यह सवाल पेश आये कि जब हमें मालूम है कि ग़दीर के ज़िक्र के साथ और तारीख़ भी इस बात की शाहिद है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) को इस बात का बख़ूबी इल्म था कि इत्तेहाद का मुतहक़्क़क़ होना मुमकिन नही है क्योकि बनी उमय्या हज़रत अली (अ) और बनी हाशिम के शदीद और सख़्त मुख़ालिफ़ हैं। नबी ए अकरम (स) को इस बात का अहसास था कि बनी उमय्या मौला ए कायनात हज़रत अली (अ) की विलायत को आसानी से क़बूल नही करेंगें मगर आप फिर भी मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर ऐलान फ़रमाते रहे और यह मसला हमारी राह में रुकावट नही बनना चाहिये कि हमारे अहले सुन्नत बरादरान कभी भी इस दावत को क़बूल नही करेंगें? जवाब निहायत वाज़ेह और रौशन है और वह यह कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने हक़ व हक़्क़ानियत को बयान करने में ऐहमाल या सहल अँगारी से काम नही लिया और मलामतों की परवाह न की बल्कि आप ने अपनी 23 साला हयाते मुबारक में हर मौक़े पर हर तरह से विलायत के सिलसिले का तआरुफ़ कराया और उसे लोगों के सामने पहुचाया। आपके यक़ीनन इस बात का इल्म था कि आपकी वफ़ात के बाद लोग इस मसले में इख़्तिलाफ़ करेंगें। मगर इन सब बातों के बावजूद आप मसअल ए ग़दीर और मसअल ए इमामत व विलायत को लोगों के सामने बयान फ़रमाते रहे और जैसा कि क़ुरआने मजीद का इरशाद है कि वमा अलैना इल्लल बलाग़ यानी पैग़म्बर का काम पैग़ाम को पहुचा देना है। और इमामे उम्मत हज़रत इमाम ख़ुमैनी का यह जुमला भी बहुत मशहूर है कि हमारा काम इबलाग़ करना और पहुचा देना है, अंजाम और नतीजे से हमें सरोकार नही होना चाहिये। अंजाम ख़ुदा वंदे आलम के हाथ में है और सिर्फ़ वह है जिसे गै़ब का और अपनी मसलहत का इल्म है।

आख़िर में ख़ुदा वंदे आलम से दुआ है कि वह हमें ग़दीर की मारेफ़त अता करे, इमामत की मारेफ़त अता करे, अपनी हुज्जत और इमामे ज़माना की मारेफ़त अता करे, उनके ज़हूर में ताजील अता फ़रमाएं कि उनका ज़हूर ग़दीर के तहक़्क़ुक़ और मुसतज़अफ़ीने जहान की आख़िरी उम्मीद है।

व आख़िरो दअवाना अनिल हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन।