हज़रत खदीजा (स) की तदफ़ीन |


हज़रत खदीजा (स) की तदफ़ीन
हज़रत खदीजा (स) की तदफ़ीन
  हज़रत खदीजा (स) की तदफ़ीन


हज़रत ख़दीजा (स) के पाक मुक़द्दस पैकर को कफ़न पहनाने के बाद हजून नामी पहाड़ी के दामन में ले जा कर हज़रत अबू तालिब (अ) के मरक़दे मुतह्हर के पास दफ़्न किया गया। पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत खदीजा (स) की वसीयत के मुताबिक़ क़ब्र में उतर कर आप के पैकरे मुतह्हर को अपने हाथों से ख़ाक के सुपुर्द कर दिया।[1] चौदह सदियाँ गुज़रने के बाद भी सैकड़ों की तादाद में ज़ायरीन, हज़रत ख़दीजा (स) की कब्र की ज़ियारत के लिये हज व उमरे के अय्याम में जाते हैं। शियों के बाज़ बुज़ुर्ग मराजे ए तक़लीद ने आपकी क़ब्रे मुतह्हर की ज़ियारत के मुसतहब होने का फ़तवा दिया है।[2] आप की क़ब्रे मुतहहर के ऊपर एक पुर शिकोह गुँबद हमेशा रहा है लेकिन 1344 हिजरी में वहाबियों के हाथों वह गुँबद ख़ाक में मिल गया।

हज़रत ख़दीजा (स) की रेहलत के बाद हज़रत ज़हरा (स) परवाने की तरह पैग़म्बर (स) के वुजूद के गिर्द घूमती थीं और आप से सवाल किया करती थीं: ऐ बाबा, मेरी माँ कहाँ हैं? पैग़म्बरे इस्लाम (स) हज़रत ख़दीजा (स) के जन्नत में बुलंद मक़ाम को बयान करते हुए अपनी लख़ते जीगर को तसल्ली देते थे।[3]

पेशवाओं के पेशवा, अमीरे बयान, हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम ने हज़रत ख़दीजा (स) के ग़म में एक क़सीदा पढ़ा है जिस में आप के फ़ज़ायल व मनाक़िब पर रौशनी डाली है।[4]

हज़रत ख़दीजा (स) का मैदाने महशर में तशरीफ़ लाना

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने हज़रत खदीजा (स) के मैदाने महशर में तशरीफ़ आवरी को यूँ बयान किया है: सत्तर हज़ार फ़रिश्ते आप के इस्तिक़बाल में दौड़ते हुए आयेगें। इस हाल में कि हाथों में परचम लिये हुए होगें और उन परचमों पर अल्लाहो अकबर लिखा हुआ होगा।[5]

हज़रत ख़दीजा (स) की ख़िदमात की क़द्रदानी

पैग़म्बरे अकरम (स) हमेशा हज़रत ख़दीजा (स) की बेनज़ीर ख़िदमात को याद करते थे और हज़रत ख़दीजा (स) को बक़िया अज़वाज पर तरजीह देते थे।[6] जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) दस हज़ार जंगी लश्कर लेकर मक्क ए मुअज़्ज़ा में दाख़िल हुए और उसे फ़तह कर लिया तो अशराफ़े मक्का गिरोह दर गिरोह आप की ख़िदमत में आये और बहुत ज़्यादा इसरार करने लगे कि हमारे घर तशरीफ़ लायें लेकिन पैग़म्बर (स) ने उन की बातों की मुवाफ़िक़त न की और सीधे जन्नतुल मुअल्ला आ गये। वहाँ पहुच कर हज़रत ख़दीजा (स) के मरक़दे मुतह्हर के क़रीब ख़ैमा लगाया और जितने दिन मक्के मे रहे अपनी गुमशुदा अज़ीज़ा के पास रहे और उस दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ज़ुबैर बिन अवाम को हुक्म दिया कि जो परचम तुम्हारे हाथ में है उसे हज़रत ख़दीजा (स) की क़ब्रे मुतह्हर के पास नस्ब करो और उसे वहाँ से न उठाना।

फिर हुक्म दिया कि लश्कर के कमान्डर का ख़ैमा हज़रत ख़दीजा (स) के मरक़दे मुतह्हर के क़रीब लगाया जाये जब ख़ैमा लग गया तो आप ख़ैमे तशरीफ़ लाये और वहाँ से अहकाम सादिर किये और वाक़ेयात का जायज़ा लिया और आख़िरकार उसी मक़ाम से शहर में दाख़िल हुए।[7] पैग़म्बर (स) का यह अहम काम एक तो हज़रत ख़दीजा (स) के ईसार व क़ुर्बानियों की हक़ीक़ी पहचान था और दूसरे हज़रत ख़दीजा (स) के नाम अहम पैग़ाम था कि ऐ ख़दीजा, ऐ सब्र की पैकर, ऐ मेरी वा वफ़ा ज़ौजा, चूँ कि ज़िन्दगी के सख़्त दिनों में, कुरैश की जान लेवा घबराहट के दौर में, इक़्तेसादी मुहासरों के दौरान और पुर आशोब दिनों में तुम ने मेरा साथ दिया और तमाम क़िस्म के रंज व मशक़्क़त को तहम्मुल किया लिहाज़ा अब मैं निफ़ाक़ व कुफ़्र के तमाम क़िलों को फ़तह करते हुए फ़तहे मक्का के बाद तुम्हारी पाक तुरबत के पास इसलिये आया हूँ कि ता कि ख़ुशी के दिनों को हम आपस में बाँट लें।

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[1]. अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार जिल्द 43 पेज 138

[2]. आयतुल्लाह शिराज़ी, उम्माहातुल मासूमीन पेज 95

[3]. आयतुल्लाह सैयद अब्दुल आला सब्ज़वारी, मुहज़्ज़बुल अहकाम जिल्द 14 पेज 400

[4]. तारीख़े याक़ूबी जिल्द 1 पेज 254

[5]. शरहानी, हयातुस सैयदा ख़दीजा (स) पेज 282

[6]. इब्ने शहर आशोब, मनाक़िबे आले अबी तालिब (अ) जिल्द 4 पेज 170

[7]. अल्लामा मजलिसी, बिहारुल अनवार, जिल्द 8 पेज 53