जनाबे ख़दीजा(अ)का महर |


जनाबे ख़दीजा(अ)का महर
जनाबे ख़दीजा(अ)का महर
  जनाबे ख़दीजा(अ)का महर



जब जश्ने शादी इख़्तेताम पज़ीर हुआ तो हज़रत खदीजा (स) के चचा ज़ाद भाई वरक़ा बिन नौफ़ल ने कहा: ख़दीजा का महर चार हज़ार दीनार है। हज़रत अबू तालिब (अ) ने शादमानी से उसे क़बूल किया लेकिन हज़रत ख़दीजा (स) ने महर की रक़्म अपने ज़िम्मे ली और चार हज़ार दीनार की शक्ल में पूरी रक़्म पैग़म्बरे इस्लाम (स) के चचा हज़रत अब्बास के पास भेज दी ताकि उस रक़्म को जश्न में आपके पिदरे बुज़ुर्गवार ख़ुवैलद को अता किया जाये।[1] जब महर की रक़्म हज़रत ख़दीजा (स) की ख़िदमत में पहुची तो आपने वरक़ा को हुक्म दिया कि इसे पैग़म्बर (स) की ख़िदमत में पेश किया जाये और यह भी अर्ज़ किया जाये कि मेरा सारा माल आप से मुतअल्लिक़ हैं। वरक़ा बिन नौफ़ल ने आबे ज़मज़म व मक़ामे इब्राहीम के दरमियान खड़े होकर बुलंद आवाज़ से ऐलान किया: ऐ उम्मते अरब हज़रत ख़दीजा (स) महर की रक़्म समेत तमाम अमवाल ग़ुलाम और कनीज़ों को पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़िदमत में पेश कर रही हैं और इस सिलसिले में आप को गवाह बना रही है।[2] तब हज़रत ख़दीजा (स) ने अपने तमाम माल व मनाल, सरवत व दौलत यहाँ तक कि इत्र व लिबास को भी हज़रत अबू तालिब (अ) के हवाले कर दिया ता कि वलीमे की शक्ल में इस शादी की रुसूम अंजाम दीं। हज़रत अबू तालिब (अ) ने तीन दिन के लिये दस्तर ख्वान बिछा दिया। जिस मे मक्का और अतराफ़े मक्का के सब लोगों को दावत दी गई।[3] यह सब से पहला वलीमा था जिस का बंदोबस्त पैग़म्बर (स) की जानिब से अंजाम पाया।[4] सीर ए हलबिया में लिखा है कि हज़रत अबू तालिब (अ) ने मज़कूरा महर की रक़्म के अलावा बीस अदद ऊँट को अपने माल से हज़रत खदीजा (स) के महर मं इज़ाफ़ा किया लेकिन तबरसी अर्ज़ करते हैं कि हज़रत खदीजा (स) का महर बक़िया अज़वाज की तरह साढ़े बारह सिक़्ल था। (जो सुन्नती महर है।)(5)




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[1]. इब्ने शहरे आशोब, मनाक़िबे आले अबी तालिब जिल्द 1 पेज 41

[2]. कुलैनी, अल काफ़ी जिल्द 5 पेज 374

[3]. सैयद अब्दुर रज़्ज़ाक़ मुक़र्रम, वफ़ातुज़ ज़हरा (स) पेज 7

[4]. शेख़ तूसी, मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह जिल्द 3 पेज 397

[5]. अब्दुल मुनईम, उम्मुल मोमिनीन ख़दीजा पेज 40