ख़ुत्बा-112 |


ख़ुत्बा-112

ख़ुत्बा-112
 



ख़ुत्बा-112



ख़ुत्बा-112 तमाम हम्द उस अल्लाह के लिये है जो हम्द का पैवन्द नेमतों से और नेमतों का सिलसिला शुक्र से मिलाने वाला है हम उस की नेमतों पर उसी तरह हम्द करते हैं, जिस तरह उस की आज़्माइशों पर सना व शुक्र बजा लाते हैं। और उन नफ़्सों के खिलाफ़ उस से मदद मांगते हैं। कि जो अह्काम से बजा लाने में सुस्त क़दम और मम्नूउ (वर्जित) चीज़ों की तरफ़ बढञने में तैज गाम (द्रुतगामी) हैं। और उन गुनाहों से मग़फ़िरत चाहते हैं कि जिन पर उस का इल्म मुहीत (छाया हुआ) और नामए अअमाल (कर्म पंजिका) हावी (व्याप्त) है। न इल्म कोई कमी करने वाला है और न नामए अअमाल किसी चीज़ को छोड़ने वाला है। हम उस शख्स के मानिन्द (समान) उस पर ईमान रखते हैं कि जिस ने ग़ैब की चीज़ों को अपनी आंखों से देख लिया हो, और वअदा की हुई चीज़ों से आगाह (अवगत) हो चुका हो। ऐसा ईमान कि जिस के खुलूस ने शिर्क को और यक़ीन ने शक को दूर फेक दिया हो, और हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के अलावा कोई मअबूद नहीं जो वहदहू ला शरीक है और यह कि मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलैही वसल्लम उस के अब्द और रसूल (स.) हैं। यह दोनों शहादतें (गवाहियां) अच्छी बातों को ऊंचा और नेक अअमाल को बलन्द करती हैं। जिस तराज़ू में उन्हें रख़ दिया जायेगा उस का पल्ला हलका नहीं होगा और जिस मीज़ान (तराज़ू) से इन्हें अलग कर लिया जायेगा, उस का पल्ला भारी नहीं हो सकता।

ऐ अल्लाह के बन्दों !मैं तुम्हें अल्लाह से डरने की नसीहत करता हूं। इसलिये कि यही तक़्वा ज़ादे राह है। और इसी को लेकर पलटना है। यह ज़ाद (मंज़िल तक) पहुंचने वाला और यह पलटना कामयाब पलटना है। इस की तरफ़ सब से बहतर सुना देने वाले ने दअवत दी, और बेहतरीन सुनने वाले ने उसे सुन कर महफ़ूज़ कर दिया चुनांचे दअवत देने वाले ने सुना दिया, और सुनने वाला बहरा अन्दोज़ हो गया। अल्लाह के बन्दों ! तक़्वा ही ने अल्लाह के दोस्तों को मनहीयात से बचाया है और उन के दिलों में ख़ौफ़ पैदा किया है यहां तक कि उन की रातें जागते और तपती हुई दोपहरें प्यास में गुज़र जाती हैं, और इस तअब व किल्फ़त (कष्ट एवं दुख़) के एवज़ राहते दाइमीं, और इस प्यास के बदले में तस्नीम व कौसर से सेराबी (तृप्ति) हासिल करते हैं। उन्हों ने मौत को क़रीब समझ कर अअमाल में जल्दी की और उम्मीदों को झुटला कर अजल (मृत्यु) को निगाहोंमें रखा फ़िर यह दुनिया तो फ़ना और मशक़्कत, तग़ैय्युर और इब्रत की जगह है। चुनांचे फ़ना (नाश) करने की सूरत (हालत) यह है कि ज़माना (समय) अपनी कमान का चिल्ला चढ़ाए हुए है जिस के तीर ख़ता नहीं करते और न उस के ज़ख़्मों का कोई मदावा (उपचार) हो सकता है। ज़िन्दा पर मौत के, तन्दुरुस्त पर बीमारी के, और महफ़ूज़ पर हलाकत के तीर चलाता रहता है। वह ऐसा ख़ाऊ है कि सेर (सन्तुष्ट) नहीं होता, और ऐसा पीने वाला है कि उस की प्यास बुझती ही नहीं और रंजो तअब (दुख एवं क्षोब) की सूरत यह है कि इन्सान माल जमअ करता है लेकिन उस में खाना उसे नसीब नहीं होता घर बनाता है मगर रहने नहीं पाता, और फ़िर अल्लाह तअला की तरफ़ इस तरह चल देता है कि ना माल साथ उठा कर ले जा सकता है और न घर ही उधर मुन्तक़िल (स्थानान्तरित) कर सकता है, और उस के तग़ैयुर (परिवर्तनशीलता) की यह हालत है कि तुम एक ऐसे शख़्स को देखते हो जिस की हालत क़ाबिले रहम (दयनीय) होती है और वह देखते ही देखते इस क़ाबिल हो जाता है कि उस पर रश्क ख़ाया जाए। और क़ाबिले रश्क आदमी को देखते हो कि चन्द ही दिनों में उस की हालत पर तरस आने लगता है। इस की यही वजह तो है कि उस से नेमत जाती रही और उस पर फ़क़्रो इफ़्लास टूट पड़ा। और उस से इब्रत हासिल करने की सूरत (उपाय) यह है कि इन्सान अपनी उम्मीदों की इन्तिहा (आशाओं की चरम सीमा) तक पहुंचने वाला ही होता है कि मौत पहुंच कर उम्मीदों (आशाओं) के सारे बंधन तोड़ देती है। इस तरह यह उम्मीदें बर आती हैं और न उम्मीदें बांधने वाला ही बाक़ी छोड़ा जाता है। अल्लाह हो अकबर ! इस दुनिया की मसर्रत (प्रसन्नता) की फ़रेब कारियां (कपटता) और उस की सेराबी (तृप्ति) की तशनाकामियां (तृष्णाएं) कितनी ज़ियादा है, और उस के साए में धूप की शिरकत कितनी ज़ियादा है। न आने वाली मौत को पलटाया जा सकता है और न जाने वाला पलट कर आ सकता है। सुब्हानल्लाह ! ज़िन्दा मुर्दों से उन्हीं में मिल जाने की वजह से कितना क़रीब है, और मुर्दा ज़िन्दों से तमाम तअल्लुक़ात के टूट जाने की वजह से किस क़दर दूर है। बेशक कोई बदी से बदतर शय नहीं, सिवा उस के अज़ाब के, औऱ कोई अच्छाई से अच्छी चीज़ नहीं, सिवा उस के सवाब के। दुनिया की हर चीज़ का सुनना उस के देखने से अज़ीम तर है। मगर आख़िरत (परलोक) की हर शय का देख़ना सुनने से कहीं बढ़ा चढ़ा हुआ है। तुम इसी सुनने से उस की असली हालत का, जो मुशाहिदे में आयेगी, अन्दाज़ा और ख़बर ही सुन कर उस ग़ैब की तस्दीक़ कर लो ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि दुनिया और आख़िरत का इज़ाफ़ा, उक़्बा की कमी और दुनिया के इज़ाफ़े से कहीं बेहतर है। बहुत से घाटा उठाने वाले फ़ायदे में रहते हैं और बहुत से समेट लेने वाले नुक़सान में रहते हैं। जिन चीज़ों का ख़ुदा ने तुम्हें हुक्म देते हैं और तम्हारे लिये जाएज़ रखी है उन का दामन उन चीज़ों से कहीं वसीइ (विशाल) है, जिन से रोका है, और हराम की हुई चीज़ों की वजह से कम चीज़ों को छोड़ दो और तंगनाए हराम से निकल कर हलाल की वुस्अतों में आ जाओ। उस ने तुम्हारे रिज़्क़ (जीविका) का ज़िम्मा ले लिया है और तुम्हें अअमाल बजा लाने का हुक्म दिया गया है। लिहाज़ा जिस चीज़ का ज़िम्मा लिया जा चुका है उस की तलाश व तलब अअमाल व फ़रायज़ के बजा लाने से तुम्हारी नज़रों में मुक़द्दम न होना चाहिये। मगर ख़ुदा की क़सम ! तुम्हारा तर्ज़े अमल ऐसा है कि देखने वाले को शुबाह होने लगे। और ऐसा मअलूम हो कि रिज़्क़ का हासिल करना तो तुम पर फ़र्ज़ है और जो वाक़ई तुम्हारा फ़रीज़ा है। यअनी वाजिबात का बजा लाना वह तुम से साक़ित है। अमल की तरफ़ बढ़ो और मौत के अचानक आ जाने से डरो ! इस लिये कि उम्र के पलट कर आने की आस नहीं लगाई जा सकती, जबकि रिज़्क़ के पलटने की उम्मीद हो सकती है। जो रिज़्क़ हाथ नहीं लगा कल उस की ज़ियादती की तवक़्क़ो की जा सकती है, और उम्मीद नहीं कि उम्र का गुज़रा हुआ, कल आज पलट आयेगा। उम्मीद तो आने वाले की हो सकती है और जो गुज़र जाए उस से तो मायूसी (निराशा) ही है। अल्लाह से डरो, जितना उस से डरने का हक़ है, और जब मौत आए तो तुम को बहर सूरत मुसलमान होना चाहिये।