ख़ुत्बा-113 |


ख़ुत्बा-113

ख़ुत्बा-113
 



ख़ुत्बा-113



ख़ुत्बा-113 [तलबे बारां (वर्षा) के लिये आप के दुआइया कलेमात (प्रार्थना)]

बारे इलाहा ! ख़ुश्कसाली (अकाल) से हमारे पहाड़ों का सब्ज़ा (हरियाली) बिलकुल सूख़ गया है और ज़मीन पर ख़ाक उड़ रही है। हमारे चौपाए (पशु) प्यासे हैं, और अपने चौपालों में बौखलाए फिर रहे हैं, और इस तरह चिल्ला रहे हैं जिस तरह रोने वालियां (स्त्रियां) अपने बच्चों (के मरने पर) बैन करती हैं, और अपनी चराह गाहों के फ़ेरे करने और तालाबों की तरफ़ बसद शौक़ (रूचिपूरवक) बढ़ने से आजिज़ आ गए हैं (असमर्थ हो गए हैं)। पर्वरदिगार ! इन चीख़ने वाली बक्रियों और शौक़ भरे लेहजे (रोचक स्वर) में पुकारने वाले ऊंटों पर रहम कर। खु़दाया ! तू रास्तो में इन की परिशानी और घरो में इन की चीख़ पुकार पर तरस खा। बारे ख़ुदाया ! जब कि क़ह्त साली के (अकाल ग्रस्त) लाग़र (मांसहीन) और निढ़ाल ऊंट हमारी तरफ़ पलट पड़े हैं। और बज़ाहिर (प्रत्यक्ष रूप से) बरसने वाली गटायें आ आ के बिन बरसे गुज़र गईं तो हम तेरी तरफ़ निकल पड़े हैं। तू ही दुख दर्द के मारों की आस है, और तू ही इल्तिजा (बिनती) करने वालों का सहारा है। जबकि लोग बेआस हो गए, और बादलों का उठना बन्द हो गया, और मवेशी (पशु) बेजान हो गए, तो हम तुझ से दुआ (प्रार्थना) करते हैं कि हमारे अअमाल की वजह से हमारी गिरफ़्त (पकड़) न कर, और हमारे गुनाहों की वजह से हमे अपने अज़ाब में न धर ले। ऐ अल्लाह ! तू धुआंधार बारिशों वाले अब्र (बादल) और छाजो पानी बरसाने वाली वर्षा ऋतु, और नज़रों में ख़ब जाने वाली हरियाली से अपने दामने रहमत को हम पर फैलादे। वह मूसलाधार और लगातार इस तरह बरसें की उन से भरी हुई चीज़ों को तू ज़िन्दा कर दे, और गुज़री हुई बहारों को तू पलटा दे। ख़ुदाया ! ऐसी सेराबी हो कि जो मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दा करने वाली, सेराब बनाने वाली और भरपूर बरसने वाली, और सब जगह फ़ैल जाने वाली, और पाकीज़ा व बा बरकत और ख़ुश गवार और शादाब हो, जिस से नबातात (वनस्पति) फ़लने फूलने लगें। शाख़ें (शाख़ायें) बारआवर (फ़ल दार) और पत्ते हरे भरे हो जायें और जिस से तू अपने आजिज़ (असमर्थ) व ज़मीन गीर (धराशायी) बन्दों को सहारा देकर ऊपर उठाए, और अपने मुर्दा शहरों को ज़िन्दगी बख़्श दे। ऐ अल्लाह ! ऐसी सेराबी कि जिस से हमारे टीले सब्ज़ पोश हो जायें (हरे वस्त्र धारण कर लें), और नदी नाले बह निकलें और आस पास के अतराफ़ सर सब्ज़ो शादाब हो जायें और फ़ल निकल आयें, और चौपाए (पशु) जी उठें, और दूर की ज़मीनें भी तरबतर हो जायें, और खुले मैदान में भी उस से मदद पा सकें. अपनी फ़ैलने वाली बरकतों, और बड़ी बड़ी बख़्शीशों से जो तेरी तबाह हाल मख़्लूक़ और बग़ैर चर्वाहेर के ख़ुले फ़िरने वाले हैवानों पर हैं। हम पर ऐसी बारिश हो, जो पानी से शराबोर कर देने वाली, और मूसलाधार और लगातार बरसने वाली हो। इस तरह कि बारिशें बारिशों से टकरायें, और बूंदे बूंदों को तेज़ी से धकेलें की तार बंध जाए। उस की बिजली धोका देने वाली न हो। और न उफ़ुक़ (क्षितिज) पर छा जाने वाली घटा पानी से ख़ाली हो, और सफ़ैद अब्र (बादल) के टुकड़े बिख़रे बिख़रे से हों और न सिर्फ़ हवा के ठंडे झोंको वाली बूंदा बांदी हो कर रह जाए। यूं बरसा कि क़ह्त (अकाल) के मारे हुए उस की सर सबज़ियों से खुशहाल हो जाएं, और ख़ुश्क साली (अकाल) की सख़्तियां झेलने वाले उस की बरकतों से जी उठें। और तू ही वह है जो लोगों के ना उमीद (निराश) हो जाने के बाद मेंह (पानी) बरसाता है, और अपनी रहमत के दामन फ़ैला देता है, और तू ही वाली व वारिस और अच्छी सिफ़तों (अच्छे गुणों) वाला है।