ख़ुत्बा-114 |


ख़ुत्बा-114
ख़ुत्बा-114
 



ख़ुत्बा-114




अल्लाह ने आप को हक़ की तरफ़ बुलाने वाला और मख़्लूक़ की गवाही देने वाला बना कर भेजा। चुनांचे आप ने अपने पर्वरदिगार के पैग़ामों (संदेशो) को पहुंचाया। न उस में कुछ सुस्ती की न कोताही और अल्लाह की राह में उस के दुश्मनों से जिहाद किया। जिस में न कमज़ोरी दिखाई न हीले बहाने किये। वह पर्हेज़गारों (संयामी लोगों) के इमाम और हिदायत पाने वालों (अनुदेश ग्रहण करने वालों) की आंख़ों के लिये बसारत (प्रकाश) है।

[ इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है ]

जो चीज़ें तुमसे पर्दए ग़ैब (परोक्ष के पर्दे में) लपेट दी गई हैं, अगर तुम भी उन्हें जान लेते, जिस तरह में जानता हूं, तो बिला शुबाह (निस्सन्देह) तुम अपनी बद अअमालियों (दुष्कर्मों) पर रोते हुए अपने नफ़्सों (आत्माओं) का मातम करते हुए अपने मालो मताअ को बग़ैर किसी निगह बान (संरक्षक) और बग़ैर किसी निगाह दाश्त (पोषण) करने वाले के यूं ही छोड़ छा़ड़ कर खुले मैदानों में निकल पड़ते, और हर शख़्स (व्यक्ति) को अपने ही नफ़्स (आत्मा) की पड़ी होती। किसी ओर की तरफ़ मुतवज्जह ही न होता। लेकिन जो तुम्हें याद दिलाया गया था उसे तुम भूल गए, और जिन चीज़ों से तुम्हें डराया गया था, उस से तुम निडर (निर्भीक) हो गए। इस तरह तुम्हारे ख़यालात भटक गए और तुम्हारे सारे उमूर (सारे मुआमलात) दरहम बरहम हो गए। मैंयह चाहता हूं कि अल्लाह मेरे और तुम्हारे दर्मियान जुदाई डाल दे। और मुझे उन लोगों से मिला दे जो तुम से ज़ियादा मेरे हक़दार हैं। खुदा कि क़सम ! वह ऐसे लोग हैं, जिन के ख़यालात मुबारक (विचार शुभ) और अक़्लें (बुद्धियां) ठोस थीं। वह ख़ुल कर हक़ बात कहने वाले, और सर कशी और बग़ावत को छोड़ने वाले थे। वह क़दम आगे बढ़ा कर अल्लाह की राह पर हो लिये और सीधी राह पर बे खटके दौड़े चले गए। चुनांचे उन्होंने हमेशा रहने वाली आख़िरत (परलोक) और उम्दा और पाकीज़ा नेमतों (पवित्र वर्दानों) को पा लिया तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम पर बनी सक़ीफ़ का एक लड़का तसल्लुत (आधिपत्य) पा लेगा वह दराज़ क़द होगा, और बल ख़ा कर चलेगा और तुम्हारी चरबी तक पिघला देगा। हां ऐ अबू वज़हा कुछ और।

सैयिद रज़ी फ़रमाते हैं कि वज़हा के मअनी ख़नफ़सा के हैं। आप ने अपने इस इर्शाद से हज्जाज इब्ने युसूफ़े सक़फ़ी की तरफ़ इशारा किया है। और इस ख़नफ़सा से मुतअल्लिक़ एक वाक़िआ है जिस के बयान करने का यह महल नहीं है।

इस वाक़िए की तफ़सील (घटना का ब्योरा) यह है कि हज्जाज एक दिन नमाज़ पड़ने के लिये ख़ड़ा हुआ तो ख़नफ़सा उस की तरफ़ बढ़ा। हज्जाज ने उसे हाथ बढ़ा कर रोकना चाहा मगर उस ने इसे काट लिया जिस से उस के हाथ पर वरम आ गया और आख़िर उस के असर (प्रभाव) से उस की मौत वाक़े हुई।

इब्ने अबिल हदीद ने लिखा है कि वज़हा उस गोबर को कहते हैं जो किसी हैवान (पशु) की दुम पर लगा रह गया हो और इस कुनीयत (उर्फ़ीयत) से मक़सूद (तात्पर्य) उस की तज़लील (अपमान) है।