ख़ुत्बा-115 |


ख़ुत्बा-115

ख़ुत्बा-115
 



ख़ुत्बा-115



ख़ुत्बा-115

जिस ने तुम को मालो मताअ बख़्शा है उसकी राह में तुम उसे सर्फ़ (व्यय) नहीं करते, और न अपनी जानों को उस के लिये ख़तरे में डालते हो जिस ने उन को पैदा किया है। तुमने अल्लाह की वजह से बन्दों में इज़्ज़तो आबरू (सम्मान व आदर) पाई लेकर उस के बन्दों के साथ हुस्ने सुलूक (सद व्यवहार) कर के उस का एहतिरामो इकराम (आदर व सम्मान) नहीं करते। जिन मकानात में अगले लोग आबाद थे उन में अब तुम मुक़ीम होते हो, और क़रीब से क़रीबतर भाई गुज़र जाते और तुम रह जाते हो। इस से इबरत (शिक्षा) हासिल (ग्रहण) करो।