ख़ुत्बा-119 |


ख़ुत्बा-119

ख़ुत्बा-119
 



ख़ुत्बा-119



हज़रत (अ.स.) के असहाब (साथियों) में से एक शख़्स उठ कर आप के सामने आया और कहा कि “या अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ! पहले तो आप ने हमे तह्कीम से रोका और फ़िर उस का हुक्म (आदेश) भी दे दिया। नहीं मअलूम की इन दोनों बातों में से कौन सी बात ज़ियादा सहीह है आं हज़रत ने अपने हाथ पर हाथ मारा, और फ़रमाया।

जिस ने अह्दे वफ़ा (प्रतिज्ञा) को तोड़ दिया हो, उस की यही पादाश (सज़ा) हुआ करती है। ख़ुदा की क़सम ! जब मैं ने तुम्हें तह्कीम के मान लेने का हुक्म दिया था, अगर उसी अम्रे नागवार (अप्रिय बातें) अर्थात युद्ध पर तुम्हें ठहराए रहता कि जिस में अल्लाह तुम्हारे लिये बेहतरी ही करता। चुनांचे तुम उस पर जमे रहते, तो मैं तुम्हें सीधी राह पर ले चलता, और अगर टेढ़े होते तो तुम्हें सीधा कर देता और अगर इन्कार करते तो तुम्हारा तदारुक (उपचार) करता, तो बिलाशुब्हा निस्सन्देह) यह एक मज़बूत तरीक़ए कार (सशक्त कार्य पद्धति) होता। लेकिन किस की मदद से, और किस के भरोसे पर ? मैं तुम से अपना चारा (उपचार) चाहता था और तुम ही मेरे मरज़ (रोग) निकले। जैसे कांटे को कांटे से निकालने वाला, कि वह जानता है कि यह भी उसी तरफ़ झुकेगा। ख़ुदाया ! इस मूज़ी मरज़ (घातक रोग) से चारागर (चिकित्सक) आजिज़ आ गए हैं और, इस कुयें की रस्सियां ख़ीचने वाले थक कर बैठ गए हैं। वह लोग कहां हैं कि जिन्हें इसलाम की तरफ़ दअवत दी गई तो उन्हों ने उसे क़बूल (स्वीकार) कर लिया, और क़ुर्आन को पढ़ा, तो उस पर अमल भी किया। जिहाद के लिये उन्हें उभारा गया तो इस तरह शौक़ से (रुचि पूर्वक) बढे़, जैसे दूध देने वाली ऊंटनियां अपने बच्चों की तरफ़। उन्हों ने तलवारों को न्यामों से निकाल लिया और दस्ता बदस्ता और सफ़ बसफ़ (पंक्तिबद्ध) बढ़ते हुए ज़मीन (पृथ्वी) के अतराफ़ (दिशाओं) पर क़ाबू पा लिया। उन में से कुछ मर गए, कुछ बच गए। न ज़िन्दा रहने वालों के मुज़्दा (शुभ सूचना) से वह खुश (प्रसन्न) होते हैं, और न मरने वालोंकी तअज़ियत (संवेदना व्यक्त करने) से मुतअस्सिर (प्रभावित) होते हैं। रोने से उन की आंखें सफ़ैद, रोज़ों (ब्रतों) से उन के पेट लाग़र (मांसहीन) दुआओं (प्रार्थनाओं) से उन के होंठ (अधर) ख़ुश्क (सूखे), और जागने से उन के रंग ज़र्द (पीले) हो गए थे। और फ़िरोतनी व आजिज़ी (विनीत एवं विनय) करने वालों की तरह उन के चेहरे ख़ाक़ आलूद (मिट्टि में अटे) रहते थे। यह मेरे वह भाई थे, जो दुनिया से गुज़र गए। अब हम हक़ बजानिब हैं (अधिकारी हैं) अगर उन की दीद (दर्शन) के प्यासे हों, और उन के फ़िराक़ (वियोग) में बोटियां काटें। बेशक (निस्सन्देह) शैतान ने तुम्हारे लिये अपनी राहें (अपने मार्ग) आसान (सुलभ) कर दी हैं। वह चाहता है कि तुम्हारे दीन (धर्म) की एक एक गिरह (गांठ) खोल दे। और तुम में एकजाई (एकता) के बजाय फूट डाले। तुम उस के वसवसों (भ्रमों) और झाड़ फूंक से मुंह मोड़े रहो और नसीहत की पैशकश (उपदेश की प्रस्तुति) करने वाले का हद्या (उपहार) क़बूल (स्वीकार) करो, अपने नफ़्सों में उस की गिरह (गांठ) बांध लो।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के पर्चम (ध्वज) के नीचे जंग (युद्ध) करने वाले गो आप ही की जमाअत (समूह) में शुमार होते थे मगर जिन की आंखों में आंसू, चेहरों पर ज़र्दी, ज़बानों पर क़ुर्आनी नग़मा, दिलों में ईमानी वलवला, पैरों में सबातो क़रार, रुह में अज़्मो हिम्मत और नफ़्स में सब्र व इसतिक्रामत का जोहर होता था, इन ही को शीअयान अली (अ.स.) कहा जाता है। और यही वह लोग थे कि जिन की जुदाई में अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के दिल की बेताबियां आह बन कर ज़बान से निकल रही हैं, और आतशे फ़िराक़ (वियोग अग्रि) के लूके क़ल्बो जिगर को फ़ूंके दे रही हैं। यह वह लोग थे जो दिवाना वार मौत की तरफ़ लपकते थे, और बच रहने पर उन्हें मसर्रत व शादमानी नहोती थी।

जिस इन्सान में इन सिफ़ात की थोड़ी बहुत झलक होगी, वही मुत्तबेए आले मोहम्मद अलैहे व आलैहिमुस्सलातो वस्सलाम और शीअए अली अलैहिस सलाम कहला सकता है। वर्ना यह एक ऐसी लफ़्ज़ (शब्द) होगी जो अपने मअनी (अर्थ) खो चुका हो, और बे महल इस्तेमाल होने की वजह से अपनी अज़मत गंवा चुका हो। चुनांचे रिवायत में है कि अमीरुल मोमिमीन (अ.स.) ने एक जमाअत (समूह) को अपने दरवाज़े (द्वार) पर देखा तो क़ंबर से पूछा कि यह कौन है ? क़ंबर ने कहा कि या अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) यह आप के शीआ हैं। यह सुन कर हज़रत की पेशानी पर बल आ गया। फ़रमाया “क्या वजह है कि यह शीआ कहलाते हैं, और इनमें शीओं की कोई अलामत नज़र नहीं आती ? ” इस पर क़ंबर ने दर्याफ्त किया कि शीओं की अलामत (लक्षण) क्या होती हैं ? तो हज़रत ने जवाब में फ़रमाया :--

“भूक से उन के पेट लाग़र (मांसहीन), प्यास से उन के होंट खुश्क (सूखे) और रोने से उन की आंखें बे रौनक़ हो गई होती हैं।”