अक़दे मुवक़्क़त(मुताअ) |


अक़दे मुवक़्क़त (मुताअ)

अक़दे मुवक़्क़त (मुताअ)
 



अक़दे मुवक़्क़त(मुताअ)




हमारा अक़ीदह है कि अक़्दे मुवक़्क़त एक शरई अमल है जो इस्लामी फ़िक़्ह में मुताअ के नाम से मशहूर है। इस तरह अक़दे इज़दवाज (शादी व्याह) की दो क़िस्में है।

एक इज़दवाजे दाइम जिसका वक़्त व ज़मान महदूद नही है।

दूसरे इज़दवाजे मुवक़्क़त इसकी मुद्दत शोहर बीवी की मुवाफ़ेक़त से तै होती है।

अक़्दे मुवक़्क़त बहुत से मसाइल में अक़्दे दाइम के मशाबेह है। जैसे मेहर, औरत का शादी में माने हर चीज़ से ख़ाली होना, अक़दे मुवक़्क़त के ज़रिये पैदा होने वाली औलाद और अक़्दे दाइम से पैदा होने वाली औलाद के अहकाम के दरमियान कोई फ़र्क़ नही पाया जाता, अक़द की मुद्दत तमाम होने के बाद इद्दत ज़रूरी है। यह सब चीज़े हमारे यहाँ अक़्दे मुवक़्क़त के मुसल्लेमात जुज़ हैं। दूसरे अलफ़ाज़ में मुताअ शादी की एक क़िस्म है शादी की तमाम ख़ुसूसियात के साथ।

बस मुताअ व अक़दे दाइम में यह फ़र्क़ पाया जाता है कि मुताअ में औरत का ख़र्च मर्द पर वाजिब नही है और शोहर व बीवी एक दूसरे से इर्स नही पाते। लेकिन अगर उन के औलाद हो तो वह माँ बाप दोनों से विर्सा पाते हैं।

हम ने इस हुक्म को क़ुरआने करीम से हासिल किया है “फ़मा इस्तमतअतुम बिहि मिन हुन्ना फ़आतू हुन्ना उजूरा हुन्ना फ़रिज़तन ”यानी तुम जिस औरत से मताअ करो उसका मेहर अदा करो।

बहुत से मशहूर मुहद्दिसों व मुफ़स्सिरों ने इस बात की तसरीह की है कि यह आयत मुताअ के बारे में है।

तफ़सीरे तबरी में इस आयत के तहत बहुत सी ऐसी रिवायतें नक़्ल हुई हैं जो इस बात की निशानदेही करती हैं कि यह आयत मुताअ के बारे में है और इस के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के असहाब के एक बहुत बड़े गिरोह ने गवाहियाँ भी दी हैं।

तफ़सीरे दुर्रे मनसूर व सुनने बहीक़ी में भी इस बारे में बहुत सी रिवायतें बयान हुई हैं। सही बुख़ारी, सही मुसलिम, मुसनदे अहमद और दूसरी बहुत सी किताबों में ऐसी रिवायतें मौजूद हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में मुताअ के रिवाज को साबित करती हैं। अहले सुन्नत के कुछ फ़क़ीहों का यह अक़ीदह है कि अक़्दे मुताअ पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में राइज था यह हुक्म बाद में नस्ख़ हो गया। लेकिन अहले सुन्नत के ही कुछ फ़क़ीह यह कहते हैं कि यह हुकम पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की ज़िन्दगी तक जारी रहा मगर बाद में इसको हज़रत उमर ने नस्ख़ कर दिया। इस बारे में हज़रत उमर की हदीस का मौजूद होना इस बात की गवाही के लिए काफ़ी है। उन्होंने फ़रमाया कि मुतअतानि कानता अला अहदि रसूलि अल्लाहि व अना मुहर्रिमुहुमा व मुआक़िब अलैहिमा मुतअतुन निसा व मुतअतुल हज्ज। यानी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में जो दो मुतआ राइज थे मैने उनको हराम कर दिया है और इन को अंजाम देने वाले अफ़राद को सज़ा दूँगा, एक मुता-ए-निसा और दूसरा मुता-ए-हज।

इस बात में कोई शक नही है कि अहले सुन्नत के दरमियान इस इस्लामी हुक्म के बारे में दूसरे बहुत से अहकाम की तरह इख़्तेलाफ़े नज़र पाया जाता है। कुछ लोग पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में इस के नस्ख़ के क़ाइल हैं और कुछ इस के नस्ख़ को ख़लीफ़ा-ए-सानी के दौर में मानते हैं। और एक छोटा सा गिरोह इसका कुल्ली तौर पर इंकार करता है।अहले सुन्नत में इस तरह के फ़िक़्ही मसाइल में इख़्तलाफ़ पाया जाता है। लेकिन शिया उलमा मुतआ के शरई होने में मुत्तफ़िक़ हैं और कहते हैं कि यह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में नस्ख़ नही हुआ है और पैग़म्बर (स.) के बाद इसका नस्ख़ होना ग़ैर मुमकिन है।

बहर हाल हमारा मानना है कि अगर मुताअ से ग़लत फ़ायदा न उठाया जाये तो यह समाज की अहम ज़रूरत है और उन जवानों के लिए फ़यदे मन्द है जो दाइमी निकाह करने पर क़ादिर नही हैं। या वह अफ़राद जो तिजारत, नौकरी या किसी दूसरी बिना पर एक लम्बे वक़्त तक अपने घर से दूर रहते हैं और जिस्मानी ज़रूरत को पूरा करने के लिए उनको तवाइफ़ों के दरवाज़ों को खटखटाना पड़ता है। ख़ास तौर पर हमारे ज़माने में मुताअ बहुत मुफ़ीद है क्योँकि आज कल इंसान के सामने बहुतसी मुश्किलें है जिनकी वजह से शादीयाँ काफ़ी सिन गुज़र जाने के बाद हो रही है। दूसरी तरफ़ शहवत बढ़ाने वाले आमिल बहुत तेज़ी से फैल रहे हैं। अगर इन हालात में मुताअ का दरवाज़ा बंद हो गया तो तवाइफ़ों के दरवाज़े यकीनी तौर पर आबाद हो जायेंगे।

हम इस बात की एक बार और तकरार करते हैं कि हम इस हुक्म शरई की आड़ में हर क़िस्म का ग़लत फ़यदा उठाने, इस पाकीज़ा हुक्म को हवस परस्त अफ़राद के हाथों का खिलौना बनाने,औरतों को दलदल में फँसाने के सख़्त मुख़ालिफ़ हैं। लेकिन कुछ हवस परस्त लोगों के ग़लत फ़ायदा उठाने की वजह से अस्ल हुक्म से मना नही करना चाहिए बल्कि लोगों को ग़लत फ़यदा उठाने से रोकना चाहिए।