नमाज़े जमाअत दुशमनों के सामने |


नमाज़े जमाअत मुसल्लह दुशमनों के सामने
नमाज़े जमाअत मुसल्लह दुशमनों के सामने
 



नमाज़े जमाअत मुसल्लह दुशमनों के सामने


हम क़ुरआने करीम के सूरए निसा की आयत न.102 में पढ़ते हैं कि ऐ रसूल जब तुम लोगों के दरमियान हो तो नमाज़ क़ाइम करो। लेकिन जब तुम्हारे सामने मुसल्लह दुश्मन हो तो पहली सूरत तो यह है कि सब लोग आपकी इक़्तदा न करें (यानी कुछ लोग आपके पीछे नमाज़ पढ़े और बाक़ी दुश्मन से हिफ़ाज़त करें) और दूसरी सूरत यह है कि जो लोग आपकी इक़्तेदा करें उनको चाहिए कि अपने हथियारों के साथ आपकी इक़्तेदा करें। और आपसी भेद भाव को रोकने के लिए यह होना चाहिए कि पहली रकत मे एक दस्ता आपकी इक़्तेदा करे और दूसरी रकत जल्दी से जुदागाना पढ़ कर नमाज़ को तमाम कर के हिफ़ाज़त कर रहे दस्ते की जगह पहुँच जाये। ताकि हिफ़ाज़त करने वाला दस्ता नमाज़ की दूसरी रकत मे आपकी इक़्तेदा करे। ताकि जमाअत भी न छुटे और दुमन की तरफ़ से ग़फ़लत भी न रहे। और इस्लामी सिपाहियों के बीच भेद भाव भी पैदा न होने पाये। मुसलमानों को चाहिए कि अपनी जगह बदलते वक़्त इतनी तेज़ी करें कि दूसरी रकत मे शरीक हो जायें।

इससे ज़ाहिर होता है कि सिपाहियों का पहले से बावज़ू होना और जंग की हालत मे नमाज़ के मसाइल से आगाह होना ज़रूरी है।

इस आयत का मफ़हूम फ़िल्मी कहानी मे बदलने के क़ाबिल है। क्योंकि यह दिलचस्प भी है और जंग की हालत मे इबादत के तरीक़े को भी ब्यान करता है। इसमे नमाज़े जमाअत की अहमियत, काम की फुर्ती, अदालत, भेद भाव का खात्मा, अल्लाह की तरफ़ तवज्जुह और दुशमन से ग़ाफ़िल न होना सभी कुछ तो ब्यान किया गया है।