नमाज़ और तंबीह(डाँट डपट) |


नमाज़ और तंबीह(डाँट डपट)
नमाज़ और तंबीह(डाँट डपट)
 



नमाज़ और तंबीह(डाँट डपट)


नमाज़ को रिवाज देने(प्रचलित करने) के लिए समाजी दबाव भी डाला जा सकता है। जैसे रसूले अकरम (स.) के ज़माने मे मैदाने जंग से भागने वाले मुनाफ़ेक़ीन पर समाजी दबाव डाला गया जिसका ज़िक्र क़ुरआने करीम के सूरए तौबा की 83वी आयत मे किया गया है “ कि ऐ रसूल जब इन मुनाफ़ेक़ीन मे से कोई मरे तो उसकी नमाज़े जनाज़ा मत पढ़ाना और न ही उसकी कब्र पर खड़े होना।”

मैं कभी नही भूल सकता कि ईरान इराक़ की जंग के दौरान एक जवान ने वसीयत की थी कि अगर मैं शहीद हो जाऊँ तो मुझे उस वक़्त तक दफ़्न न करना जब तक आपस मे लड़े हुए ये दो गिरोह आपस मे मेल न कर लें। ( अस्ल वाक़िआ यह है कि यह शहीद जिस जगह का रहने वाला था उस जगह पर मोमेनीन को दो गिरोह के दरमियान किसी बात पर इख्तिलाफ़ हो गया था और दोनो ही गिरोह किसी तरह भी आपस मे मेल करने के लिए तैयार नही थे।)

इस जवान ने अपने मुक़द्दस खून के ज़रिये मोमिनीन के दरमियान सुलह कराई। जब कि वह यह भी कह सकता था कि अगर मैं शहीद हो जाऊँ तो फलाँ इंसान या गिरोह को मेरे जनाज़े मे शामिल न करना। और इस तरह वह फ़ितने और फ़साद को और फैला सकता था, मगर उसने इसके बजाये दो गिरोह के बीच सुलह का रास्ता इख्तियार किया।