कुछ सूरों का अनुवाद |


सूरए बक़रा का अनुवाद




सूरए बक़रा का अनुवाद
 


सूरए बकरा आयत 1_91



शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम (दयालु व कृपालु) है।

1. यह अक्षर, अल्लाह व पैग़म्बर (स.) के मध्य एक रहस्य है।

2. यह (महान) किताब जिसके (हक़) होने में कोई संदेह नहीं है, मुत्तक़ी (नेक) लोगों का मार्ग दर्शन करती है।

3. (मुत्तक़ी) वह लोग हैं जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं, नमाज़ को क़ाइम करते हैं और जो धन हमने उन्हें दिया है उसमें से अल्लाह के नाम पर ख़र्च करते हैं।

4. वह लोग, उस पर भी ईमान रखते हैं जो आप पर नाज़िल हुआ है और उस पर भी जो आप से पहले (नबियों पर) नाज़िल हुआ था और वह क़ियामत पर भी यक़ीन रखते हैं।

5. वह सभी अपने रब की तरफ़ से हिदायत पर हैं तथा वही सब सफलता पाने वाले हैं।

6. जिन लोगों ने कुफ़्र को अपना लिया है, चाहे आप उन्हें डरायें या न डरायें, उनके लिए समान है, वह ईमान नहीं लायेंगे।

7. अल्लाह ने उनके दिलों व कानों पर मुहर लगा दी है तथा उनकी आँखों पर पर्दा पड़ा है और उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है।

8. इंसानों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह और क़ियामत पर ईमान ले आये हैं, परन्तु वह मोमिन नहीं हैं।

9. (मुनाफ़िक़ यह समझते हैं कि) वह अल्लाह व मोमिनों को धोका दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं को धोका देते हैं, लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं।

10. मुनाफ़िक़ों के दिलों में बीमारी है बस अल्लाह उनकी बीमारी को बढ़ाता है और उनके लिए दुखदायी अज़ाब है इस लिए कि वह झूट बोलते हैं।

11. जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा जाता है कि तुम ज़मीन पर बुराई न फैलाओ तो वह कहते हैं कि हम तो केवल सुधारक हैं।

12. जान लो कि निःसंदेह वह बुराईयाँ फैलाने वाले हैं, परन्तु वह इस बात को नहीं समझते।

13. जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा जाता है कि जिस प्रकार अन्य लोग ईमान ले आये हैं तुम भी ईमान ले आओ तो वह (घमंडित स्वर में) कहते हैं कि क्या हम मूर्ख लोगों की तरह ईमान ले आयें ? समझ लो कि वही मुर्ख हैं, परन्तु वह (अपनी मुर्खता) को नहीं जानते।

14. वह (मुनाफ़िक़) जब मोमिनों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आये और जब अपने (हम फ़िक्र) शैतानी लोगों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो केवल ईमानदारों का मज़ाक़ बना रहे हैं।

15. अल्लाह उनका मज़ाक़ बनाता है और उन्हें उनकी सरकशी में मोहलत देता है ताकि वह इधर उधर भटकते फिरें।

16. यह सब लोग, वह हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही को ख़रीदा, परन्तु उन्हें इस व्यापार ने लाभ नहीं पहुँचाया (क्योंकि वह) हिदायत प्राप्त करने वालों के गिरोह में सम्मिलित न हो सके। (या वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सके)

17. उन (मुनाफ़िक़ों) की मिसाल ऐसी है जैसे किसी ने (रौशनी के लिए) आग रौशन की और जब आग ने चारों ओर रौशनी फैलादी तो अल्लाह ने उनकी रौशनी छीन ली और उनको अँधेरे में छोड़ दिया, उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता।

18. यह लोग (हक़ को सुनने के लिए) बहरे, (हक़ कहने के लिए) गूँगे और (हक़ को देखने के लिए) अँधे हैं। बस यह लोग (हक़) की ओर वापस नहीं पलटेंगे।

19. या उनके समान हैं जो आसमान से बरसने वाली ऐसी तेज़ बारिश में घिरे हों, जिस में अंधेरा, बादलों की गरज और बिजली की चमक हो और उन्होंने बिजली के डर व मौत के भय से अपनी उंगलियाँ अपने कानों में दे रखी हों, अल्लाह काफ़िरों को चारों ओर से घेरे है।َ

20. जल्दी ही, बिजली उनकी आँखों की रौशनी को ख़त्म करने वाली है, (जब उस बारिश व अँधेरे में आसमानी बिजली) चमकती है तो वह उसकी रौशनी में चलने लगते हैं और जब अंधेरा छा जाता है तो खड़े हो जाते हैं। अगर अल्लाह चाहे तो इनकी आँखों की रौशनी और सुनने की शक्ति को समाप्त कर सकता है, अल्लाह हर काम करने में सक्षम है।

21. ऐ इंसानों ! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें और तुम से पहले वाले लोगों को पैदा किया, ताकि तुम मुत्तक़ी बन सको।

22. वह अल्लाह जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श बनाया व आसमान को ऊँचा किया और आसमान से पानी बरसाया फिर उससे तुम्हारे रिज़्क़ फलों को उगाया। अतः किसी को अल्लाह का शरीक न बनाओं इसलिए कि तुम स्वयं जानते हो कि (न किसी बुत ने तुम्हें पैदा किया है और न ही वह तुम्हें रिज़्क़ देते हैं यह तो केवल अल्लाह के कार्य हैं।)

23. अगर तुम्हें उसमें कोई संदेह है जिस (कुरआन) को हमने अपने बन्दे पर नाज़िल किया है तो तुम उसके समान एक सूरः ले आओ और इस कार्य के लिए अल्लाह के अतिरिक्त अपने अन्य गवाहों को निमन्त्रित करो, अगर तुम सच्चे हो।

24. फिर अगर तुमने यह काम न किया और तुम इसे कदाचित नहीं कर सकते, तो उस आग से डरो जिसका ईंधन (पापी) इन्सान व पत्थर होंगे (और जिसे) काफ़िरों के लिए तैयार किया गया है।

25. जिन लोगों ने ईमान लाने के बाद अच्छे कार्य किये, उनको यह ख़ुश-ख़बरी सुना दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके (पेड़ो की जड़ों) में नहरे बह रही हैं, जब उनको इन बाग़ों के फ़ल खाने को दिये जायेंगे तो वह कहेंगे कि यह तो वही हैं जो पहले भी हमारा रिज़्क़ थे, जबकि उन्हें उनके समान फल दिये गये है (न कि स्वयं वही फल) और उनके लिए जन्नत में पवित्र जीवन साथी हैं और वह सदैव उसी में रहेंगे।

26. निःसंदेह अल्लाह, मच्छर या उससे (छोटी), बड़ी चीज़ की मिसाल देने में नहीं शर्माता, बस जो लोग ईमान ले आये वह जानते हैं कि उनके रब की ओर से यह मिसाल हक़ (सही) है, परन्तु जो काफ़िर हैं वह कहते हैं कि अल्लाह का इस मिसाल से क्या उद्देश्य है? (हाँ) अल्लाह इस मिसाल के द्वारा अनेक (लोगों) को भटका देता है और अनेक का मार्गदर्शन करता है (परन्तु जानलो कि) अल्लाह केवल व्याभिचारियों को ही भटकाता है।

27. (फ़ासिक़) वह लोग हैं जो अल्लाह को वचन देने के बाद अपने वचन को तोड़ देते हैं और अल्लाह ने जिस सम्बन्ध को बाक़ी रखने का हुक्म दिया है उसको भी तोड़ देते हैं और ज़मीन पर बुराईयाँ फैलाते हैं, वह सब घाटा उठाने वाले हैं।

28. तुम अल्लाह का कैसे इनकार करते हो, जबकि तुम मृत (शरीर) थे उसने तुम्हें जीवन दिया फिर तुम्हें मृत्यु देगा और फिर दोबारा जीवित करेगा, इसके बाद तुम उसकी ओर पलटाये जाओगे।

29. (अल्लाह) वह है, जिसने ज़मीन पर पाई जाने वाली समस्त चीज़ों को तुम्हारे लिए ही पैदा किया, इसके बाद उसने आसमान को पैदा किया तथा सात सुदृढ़ आसमान बनाये, वह प्रत्येक चीज़ का जानने वाला है।

30. जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं ज़मीन पर एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ, तो फरिश्तों ने कहा कि क्या तू ज़मीन पर उनको बसायेगा जो उस पर बुराईयाँ फैलायें व ख़ून बहाये ? जबकि हम तेरी हम्द (स्तुती) करते हैं और तेरी तक़दीस (पवित्रता का बखान) करते हैं। अल्लाह ने कहा जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

31. और अल्लाह ने आदम को समस्त नाम (संसार के रहस्य व वास्तविक्ता) सिखा दिये फिर उनको फ़रिश्तों के सामने रखा और कहा कि अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इन सबके नाम बाताओ ?

32. फ़रिश्तों ने कहा कि (ऐ अल्लाह!) तू पवित्र है, हमे तूने जो सिखाया है, हम उसके अतिरिक्त कुछ नहीं जानते, निःसंदेह तू ज्ञानी व बुद्धिमान है।

33. अल्लाह ने कहा कि ऐ आदम ! फ़रिश्तों को इन (चीज़ो) के नाम बताओ। जब आदम ने फ़रिश्तों को उन (चीज़ो) के नाम बता दिये तो अल्लाह ने कहा कि क्या मैंने तुम से नहीं कहा था कि मैं ज़मीन व आसमान के रहस्यों को जानता हूँ और तुम जो कुछ प्रकट करते या छिपाते हो उसे भी जानता हूँ।

34. जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सबने सजदा किया, परन्तु शैतान ने स्वयं को बड़ा समझा व घमंड (के कारण) सजदा नहीं किया और काफ़िरों में हो गया।

35. हमने आदम से कहा कि तुम अपनी पत्नी के साथ इस जन्नत में रहो और जहाँ से जो चाहो खाओ, परन्तु इस वृक्ष के पास न जाना, वरन् तुम अत्याचारियों में सम्मिलित हो जाओगे।

36. शैतान ने उन दोनों को डगमगाया और वह जिस जन्नत में थे, उनको उससे बाहर किया, (उस समय) हमने उनसे कहा कि नीचे जाओ इस हालत में कि तुम में से कुछ (लोग) एक दूसरे के दुश्मन होगें, अब तुम्हारा ठिकाना ज़मीन है और उसी में एक निश्चित समय तक जीवन लाभ है।

37. बस आदम ने अपने रब से कुछ कलमें सीखे फिर (उन कलमों के द्वारा तौबा की) बस अल्लाह ने अपने लुत्फ़ (कृपा) को उन पर पलटा दिया, निःसंदेह वह तौबा को स्वीकार करने वाला व दयावान है।

38. हमने कहा कि सब इस (जन्नत से ज़मीन पर) नीचे आओ, बस जब तुम्हारे पास मेरा मार्गदर्शन पहुँच जाये तो जो भी मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे उन्हें न कोई डर होगा और न वह दुःखी होगें।

39. (परन्तु) जिन्होंने कुफ़्र को अपनाया और हमारी निशानियों को झुटलाया, वह सब जहन्नमी हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

40. ऐ इस्राईल की संतानों ! मेरे उन उपहारों को याद करो जो मैंने तुम्हें प्रदान किये हैं और तुम अपने वादे को पूरा करो ताकि मैं भी अपने वादे को पूरा करूँ और केवल मुझसे डरो।

41. और हमने जो (क़ुरआन) नाज़िल किया है उस पर ईमान लाओ, क्योंकि यह उसकी पुष्टि करने वाला है जो (तौरात) तुम्हारे पास है और तुम इसका इनकार करने वालो में प्रथम न बन जाना और मेरी आयतों को सास्ती क़ीमत पर न बेंच देना और केवल मुझसे ही डरना।

42. और हक़ (सत्य) को बातिल (असत्य) से न ढकना और क्योंकि तुम वास्तविक्ता को जानते हो अतः उसे न छिपाना।

43. और नमाज़ क़ाइम करो व ज़कात दो और रुकूअ करने वालों के साथ रुकूअ करो।

44. क्या तुम लोगों को नेकी की शिक्षा देते हो और स्वयं को भूल जाते हो ? तुम तो किताब पढ़ते हो फिर बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते ?

45. सब्र व नमाज़ के द्वारा सहायता प्राप्त करो और यह कार्य ख़ाशे (अल्लाह के आज्ञाकारी व उसके सम्मुख स्वयं को निम्न समझने वाले) लोगो को छोड़ कर अन्य के लिए बहुत कठिन है।

46. ख़ाशे, वह इन्सान हैं जो अल्लाह की ओर पलटने (क़ियामत) और अल्लाह से मुलाक़ात (हिसाब किताब) पर ईमान रखते हैं।

47. ऐ इस्राईल की संतान ! मेरे उन उपहारों को याद करो जो मैंने तुम्हें प्रदान किये हैं और यह भी याद रखो कि मैंने तुम्हें समस्त संसार वासियों पर श्रेष्ठता प्रदान की है।

48. उस दिन से डरो, जिस दिन कोई किसी से (अल्लाह के अज़ाब में से) कोई चीज़ कम नहीं करेगा और न ही किसी की कोई सिफारिश स्वीकार की जायेगी और न ही किसी से कोई तावान लिया जायेगा और न ही कोई सहायता की जायेगी।

49. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम्हें आले फ़िरौन से मुक्ति दी, वह तुम्हें सदैव यातनाएं देते रहते थे, वह तुम्हारे बेटों को कत्ल कर देते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित छोड़ देते थे तथा और इस कार्य में तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी कठिन परीक्षा थी।

50. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम्हारे लिए समुन्द्र को चीरा और तुम्हें मुक्ति प्रदान की और तुम्हारे सामने फिरौनियोँ को डुबा दिया।

51. और उसको भी याद करो जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा किया और तुमने उनके (मीक़ात) में (आने) के बाद, बछड़े की पूज़ा शुरू कर दी, इस स्थिति में तुम ज़ालिम थे।

52. फिर इस (बछड़े की पूजा) के बाद हमने तुम्हें क्षमा कर दिया ताकि शायद तुम (इन उपाहारों) का शुक्र अदा कर सको।

53. और उस समय को भी याद करो जब हम ने मूसा को किताब व फ़ुरक़ान प्रदान किये, ताकि तुम हिदायत प्राप्त कर सको।

54. और उस समय को भी याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम वालो तुमने गाय की पूजा करके अपने ऊपर अत्याचार किया है, बस तुम अपने रब की तरफ़ पलट जाओ और एक दूसरे को क़त्ल करो, यह काम तुम्हारे रब के समीप तुम्हारे लिए उचित है। बस अल्लाह ने तुम्हारी तौबा को स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह तौबा स्वीकार करने वाला दयावान है।

55. और उस समय को भी याद करो जब तुमने कहा कि ऐ मूसा ! हम उस समय तक तुम पर ईमान नहीं लायेंगे जब तक अल्लाह को (अपनी आँखों के द्वारा) स्पष्ट रूप से न देख लें, बस तुम पर बिजली गिरी और तुम देखते ही रह गये।

56. फिर हम ने मृत्यु के बाद तुम्हें जीवित किया कि शायद तुम उसका शुक्र अदा करो।

57. हम ने तुम्हारे लिए बादलों का छत्र बनाया और तुम्हारे लिए मन्न व सलवा भेजा, (तथा तुम से कहा कि) हम ने जो पवित्र रिज़्क़ तम्हें प्रदान किया है तुम उसे खाओ (परन्तु तुम ने बहाने बना कर उन उपहारों को हाथों से खो दिया, याद राखो कि) उन्होंने हमारे ऊपर ज़ुल्म नहीं किया बल्कि स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया।

58. और उस समय को भी याद करो जब हम ने कहा कि इस बस्ती (बैतुल मुक़द्दस शहर) में प्रवेश करो और (इसमें मौजूद उपहारों में से) जो चाहो खाओ तथा (बैतुल मुक़द्दस की इबादतगाह के) दरवाज़े में सजदा करते हुए प्रवेश करो और हित्तातुन (अर्थात हमारे गुनाहों को गिरा दे) कहो, ताकि हम तुम्हारी ग़लतियों को माफ़ करें और अच्छे कार्य करने वालों के ईनाम में वृद्धि करें।

59. बस अत्याचारियों ने (इस) बात को उस बात से बदल दिया जो उनसें नहीं कही गई थी। (अर्थात हित्ततुन को बदल कर वह मज़ाक़ उड़ाने के लिए हिन-ततुन (गेहूँ) कहने लगे) अतः हमने उन अत्याचारियों पर उनके गुनाहों की सज़ा में, आसमान से अज़ाब भेजा।

60. और उस समय को भी याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा, तो हमने उनसे कहा कि अपने असा (सोंटे) को पत्थर पर मारो, अचानक उस पत्थर से बारह झरने फूट पड़े, (इस प्रकार कि बनी इस्राईल के बारह के बारह क़बीलों के) हर इन्सान ने अपने पानी पीने के स्थान को पहचान लिया, (हमने कहा) अल्लाह के प्रदान किये हुए रिज़्क़ में से खाओ पियो और ज़मीन पर बुराई न फैलाओ।

61. और उस समय को भी याद करो जब तुमने मूसा से कहा कि हम एक ही प्रकार के भोजन पर सब्र नहीं कर सकते, आप अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमें वह चीज़ें प्रदान करे जो ज़मीन से उगती हैं जैसे सब्ज़ी, खीरा, लहसुन दाल व प्याज़, मूसा ने कहा कि क्या तुम अच्छे भोजन के बदले निम्न भोजन चाहते हो ? (और अगर ऐसा ही है तो इस बयाबान को पार करने की कोशिश करो ताकि) शहर में प्रविष्ट हो जायें, वहाँ पर वह सभी चीज़ें उपलब्ध हैं जो चीज़े तुम चाह रहे हो, बस उन पर अपमानित व दुःखी (होने) की मुहर लगा दी गई और वह (फिर से) अल्लाह के प्रकोप में फँस गये। यह सब इस लिए हुआ कि उन्होंने अल्लाह की निशानियोँ को झुटलाया और नबियों को निर्दोष क़त्ल किया, उनके साथ यह सब इस लिए हुआ कि वह गुनाहगार, अवज्ञाकारी व विद्रोही थे।

62. वह लोग जो (इस्लाम पर) ईमान ले आये और जो यहूदी, नसारा व साबेईन हो गये उनमें से जो भी अल्लाह व क़ियामत के दिन पर ईमान ले आये और अच्छे कार्य करे उनका प्रतिकार उनके रब के पास है तथा न उन्हें कोई भय है और न ही वह दुःखी होते हैं।

63. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुमसे वचन लिया और तूर पहाड़ को तुम्हारे (सरों के) ऊपर उठाया (और तुमसे कहा कि) हमने तुम्हें जो (अल्लाह की आयतें व आदेश) दिया है उसे मज़बूती से पकड़ लो और उसमें जो कुछ भी है उसे याद करो (और उस पर क्रियान्वित रहो) शायद तुम (इस प्रकार) मुत्तक़ी बन जाओ।

64. तुम, इसके बाद (अर्थात अपने सरों पर तूर नामक पहाड़ को देख कर) फिर पलट गये, अगर तुम्हारे ऊपर अल्लाह की अनुकम्पा, दया व कृपा न होती तो तुम घाटा उठाने वालों में होते।

65. तुम, अपने उन लोगों से भली भाँती परिचित हो, जिन्होंने शनिवार को अवज्ञा की (उस दिन काम की छुट्टि नहीं की और काम किया) हमने (इस अवज्ञा के कारण) उनसे कहा कि तुम धुतकारे हुए बन्दर बन जाओ।

66. हमने इस सज़ा को उपस्थित लोगों और उनके बाद आने वाली पीढ़ी के लिए एक शिक्षा तथा मुत्तक़ी लोगों के लिए एक नसीहत बनाया है।

67. और उस समय को याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि (क़ातिल को पहचानने के लिए) एक गाय को काटो, (तो) उन्होंने कहा कि क्या तुम हमारा मज़ाक़ बना रहे हो ? (मूसा ने) कहा कि मैं अल्लाह से शरण चाहता हूँ इससे बचने के लिए कि मैं मूर्खो में से हूँ।

68. (बनी इस्राईल ने मूसा से) कहा कि अपने रब से हमारे लिए दुआ करो ताकि वह इसकी व्याख्या करे कि यह (गाय) कैसी हो ? (मूसा) ने जवाब दिया कि अल्लाह कहता है कि वह गाय न तो इतनी बूढ़ी हो कि काम न कर सकती हो और न जवान ही हो, बल्कि इन दोनों के बीच की हो। अतः तुम्हें जो आदेश दिया गया है, उसका (अति शीघ्र) पालन करो।

69. उन्होंने (मूसा से) कहा कि आप अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमारे लिए स्पष्ट करे कि यह गाय किस रंग की हो ? मूसा ने जवाब दिया कि अल्लाह कहता है कि यह गाय तेज़ पीले रंग की हो ताकि देखने वालों को अच्छी लगे।

70. उन्होंने (मूसा से फिर) कहा कि अपने रब से हमारे लिए दुआ कीजिये कि वह हमारे लिए यह स्पष्ट करे कि यह गाय कैसी हो? क्योंकि यह गाय हमारे लिए संदिग्ध हो गई है और अगर अल्लाह ने चाहा तो हम (आपके स्पष्टीकरण से) अवश्य मार्गदर्शित होंगे।

71. (मूसा ने) कहा कि अल्लाह कहता है कि यह गाय ऐसी हो जिससे न ज़मीन जोतने का काम लिया जाता हो और न खेत सीँचने का, ऐब व रोग रहित हो, उसके रंग पर किसी दूसरे रंग का धब्बा भी न हो, उन्होंने कहा कि अब आपने ठीक बात कही है। बस (उन्होंने एक ऐसी गाय तलाश करके) उसे काट ही दिया, जबकि वह ऐसा करने वाले नहीं थे।

72. और उस समय को भी याद करो जब तुम ने एक इन्सान को क़त्ल किया और इसके बाद उसके (क़ातिल) के समबन्ध में झगड़ने लगे, परन्तु अल्लाह उसे प्रकट करने वाला है, जिसको तुम छिपा रहे थे।

73. बस हमने कहा कि कटी हुई गाय का एक टुकड़ा मृतक के शरीर पर मारो (ताकि वह जीवित हो उठे व अपने क़ातिल के बारे में बताये) अल्लाह इस प्रकार मृत्य को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है शायद तुम अपनी बुद्धी से काम लेने लगो।

74. फिर इस घटना के बाद तुम्हारे दिल पत्थर के समान या उससे भी अधिक कठोर हो गये! क्योंकि पत्थरों में तो कुछ पत्थर ऐसे हैं जिनसे नहरे बहने लगती हैं और कुछ ऐसे हैं कि अगर फट जाते हैं तो उनसे पानी निकलने लगता है और कुछ पत्थर ऐसे है जो अल्लाह के भय से (पहाड़ों की ऊँचाई से) नीचे गिर जाते हैं, और अल्लाह तुम्हारे क्रिया कलापों से अनभिज्ञ नहीं है।

75. (ऐ मोमिनों! ) क्या तुम्हें उम्मीद है कि (वह पत्थर दिल यहूदी) तुम्हारे (दीन) पर ईमान ले आयेंगे ? जबकि उनमें से कुछ लोगो ने अल्लाह के कलाम (वाणी) को सुनने और समझने के बाद उसमें परिवर्तन किया, जबकि वह वास्तविक्ता को जानते थे।

76. और (यही यहूदी) जब मोमिनों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आये हैं, परन्तु इनमें कुछ लोग जब आपस में मिलते हैं तो कहते हैं कि अल्लाह ने (पैग़म्बरे इस्लाम की विशेषताओं के समबन्ध में) जिन चीज़ों का तुम्हारे लिए (तौरात में) वर्णन किया है, तुम उन्हें मुसलमानों से क्यों बताते हो, (क्या इस लिए कि) वह (क़ियामत के दिन) तुम्हारे रब के सामने, तुम्हारे विरूद्ध इसी को दलील बनायें ? बस तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते ?

77. क्या उन्हें ज्ञात नहीं है कि अल्लाह वह सब कुछ जानता है जिसे वह छिपाते हैं या प्रकट करते हैं ?

78. उन (यहूदियों) में से अशिक्षित लोग हैं, अल्लाह की किताब को अपनी इच्छाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते, वह केवल अपने विचारों के पाबन्द है।

79. धिक्कार है उन लोगों पर जो किताब को अपने हाथों से लिखते हैं और बाद में कहते हैं कि यह अल्लाह की तरफ़ से है ताकि वह उसको कम मूल्य पर बेंच सकें। अतः उस पर भी धिक्कार है जो उन्होंने अपने हाथों से लिखा और उस पर भी धिक्कार जो उन्होंने उसके द्वारा कमाया।

80. और (यहूदी) कहते हैं कि हमें दोज़ख की आग केवल कुछ दिनों के लिए ही छू सकती है,(ऐ पैग़म्बर आप) उन (यहूदियों) से कह दीजिये कि क्या तुमने अल्लाह से कोई अनुबंध किया है कि अल्लाह उस अनुबंध का उलंघन नहीं कर सकता ? या यह कि तुम अल्लाह से उस बात को सम्बन्धित कर रहे हो जिसके बारे में स्वयं नहीं जानते हो !

81. हाँ ! जिन्होंने बुराई की और उनके गुनाहों ने उन्हें घेर लिया (अर्थात गुनाहों के दुष्प्रभावों ने उनके पूरे अस्तित्व को छिपा लिया) वह सब जहन्नमी हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

82. और जो लोग ईमान लाये तथा अच्छे कार्य किये, वह समस्त जन्नती हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

83. और उस समय को भी याद करो जब हमने बनी इस्राईल से यह वचन लिया था कि तुम अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की इबादत न करना और माँ बाप, संबंधियों, यतीमो व दरिद्रों के साथ अच्छा व्यवहार करना व लोगों से शिष्टता के साथ बात चीत करना और नमाज़ को क़ाइम करना व ज़कात देना, परन्तु कुछ लोगों को छोड़ कर तुम (यह वचन देने के बाद) अपने वचन से फिर गये और तुम तो वचन से फिरने वाले थे ही।

84. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम से यह मीसाक़ (वचन) लिया था कि तुम आपस में एक दूसरे का ख़ून न बहाना, एक दूसरे को अपने वतन से बाहर न निकालना, तुम सबने इसे स्वीकार किया था और इसके गवाह भी तुम स्वयं ही हो।

85. परन्तु तुम हो कि एक दूसरे को क़त्ल करते हो, अपने में से ही एक गिरोह को उनके वतन से बाहर निकालते हो और उनके विरूद्ध ज़ुल्म में एक दूसरे की सहायता करते हो और अगर उनमें से कोई क़ैदी बनकर तुम्हारे पास आता है तो तुम फ़िदया (बदला) देकर उसे आज़ाद भी करा लेते हो, जबकि (न केवल उनका क़त्ल करना बल्कि) उनका वतन से निकालना (भी) तुम पर हराम था। क्या तुम आसमानी किताब के कुछ आदेशों पर ईमान रखते हो और कुछ का इनकार करते हो? बस तुम में से जो यह कार्य करते हैं उनकी सज़ा यह है कि उन्हें इस संसार में ज़लील किया जाये और क़ियामत में कठिन से कठिन अज़ाब की ओर धकेला जाये, तुम जो भी करते हो अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं है।

86. यह सब, वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत (परलोक) के बदले दुनिया ख़रीद ली है, अतः न उनके अज़ाब में कोई ढील होगी और न ही उनकी सहायता की जायेगी।

87. निःसंदेह हमने मूसा को किताब (तौरात) दी और उनके बाद निरन्तर नबी भेजे तथा हमने ईसा पुत्र मरियम को स्पष्ट मोजज़े (चमत्कार) प्रदान किये और रूहुल क़ुदुस के द्वारा उनका अनुमोदन किया, फिर जब तुम्हारे पास कोई रसूल तुम्हारी इच्छाओं के विपरीत (पैग़ाम) लेकर आया तो तुमने उसके सामने घमंड किया (और उस पर ईमान लाने के स्थान पर) तुमने कुछ को झुटलाया तथा कुछ को क़त्ल किया, क्यों !?

88. उन्होंने (नबियों) से कहा कि हमारे दिल ग़िलाफ़ में लिपटे हुए हैं (हम तुम्हारी किसी भी बात को नहीं समझते), ऐसा नहीं है, बल्कि अल्लाह ने उनके कुफ़्र के कारण उन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया है (इसी कारण वह किसी भी बात को नहीं समझ पाते) अतः बहुत कम ईमान लायेंगे।

89. और जब उनके पास अल्लाह की ओर से वह किताब (कुरआन) आई, जो उनके पास मौजूद निशानियों की पुष्टि करने वाली है, और जिसके आने से पहले वह स्वयं यह खुशखबरी सुनाते थे कि (नये पैगम्बर व किताब की सहायता से) दुश्मनों पर विजय प्राप्त करेंगे, परन्तु जब वह (किताब व पैग़म्बर जिनको वह पहले से) जानते थे उनके पास आये तो उन्होंने उसका इनकार कर दिया, बस काफ़िरों पर अल्लाह की लानत है।

90. कितनी बुरी है वह चीज़, जिसके बदले में उन्होंने स्वयं को बेंचा, ईर्ष्या के कारण अल्लाह की भेजी हुई (आयतों) का इनकार किया (और कहा) कि अल्लाह अपने फ़ज़्ल (अनुकम्पा) से अपने जिस बन्दे पर चाहता है (आयतों को) क्यों नाज़िल करता है ? बस वह अल्लाह के दोहरे प्रकोप के भागीदार हैं और काफ़िरों के लिए ज़लील करने वाला अज़ाब है।

91. और जब उनसे कहा जाता है कि जो अल्लाह ने नाज़िल किया है उस पर ईमान ले आओ तो कहते हैं कि हम केवल उस पर ईमान लाते हैं जो हमारे (पैग़म्बरों) पर नाज़िल हुआ है और इसके अतिरिक्त सब का इनकार कर देते हैं, जबकि यह (कुरआन) हक़ है और जो (तौरात) उनके पास है उसकी पुष्टी करता है। (ऐ पैग़म्बर) आप उनसे कह दीजिये कि अगर तुम्हारा (उन आयतो पर जो तुम पर नाज़िल हुई थीं) ईमान था तो तुम इससे पहले अल्लाह के नबियों को क्यों क़त्ल करते थे ?
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सूरए बक़रा का अनुवाद
सूरए बक़रा का अनुवाद
 


सूरए बकरा आयत 92.


92. निःसंदेह मूसा (उन सब) मोजज़ों के साथ तुम्हारे पास आये, परन्तु तुमने उनके (अनुपस्थित होने के) बाद बछड़े को अपना (खुदा) बना लिया और तुम तो ज़ालिम थे ही।

93. और उस समय को भी याद करो जब हमने तुम से वचन लिया और तूर पहाड़ को तुम्हारे ऊपर लटकाया (और तुम से कहा कि) हमने तुम्हें जो आदेश दिये हैं उनको मज़बूती से पकड़ो और सुनो (उसके अनुसार कार्य करो) (उन्होंने कहा) कि हमने सुना और गुनाह किया, उन्होंने अपने कुफ़्र के कारण बछड़े की पूजा में दिल लगाया। (ऐ पैग़म्बर !) आप उनसे कह दीजिये कि अगर तुम ईमानदार होने का दावा करते हो तो तुम्हारा ईमान तुम्हें बुरी चीज़ का आदेश देता है।

94. (ऐ पैग़म्बर ! आप यहूदियों से) कह दीजिये कि अगर अल्लाह के यहाँ दारे आख़ेरत (परलोक) समस्त लोगों के लिए न हो कर, केवल तुम्हारे ही लिए है तो अगर तुम अपने कथन में सच्चे हो तो मौत की इच्छा करो।

95. परन्तु उन्होंने जो आगे भेज दिया है उसके कारण वह कभी भी मौत की इच्छा नहीं करेंगे, अल्लाह अत्याचारियों को अच्छी तरह जानता है।

96. (ऐ पैग़म्बर !) आप, इंसानों में सबसे अधिक यहूदियों को सांसारिक जीवन का लोलुप पायेंगे (यहाँ तक कि यह लोग सांसारिक जीवन व धन जमा करने के प्रति) मुशरिकों से भी अधिक लालची हैं, उनमें से प्रत्येक हज़ार साल जीवित रहना चाहता है, जबकि (अगर) उन्हें इतनी लम्बी आयु प्रदान करदी भी जाये तब भी वह उन्हें अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकती, (क्योंकि) अल्लाह उनके कार्यो को देख रहा है।

97. (यहूदी कहते हैं कि जो फ़रिश्ता आप पर “वही” लाता है, वह जिबरील है और जिबरील से हमारी दुश्मनी है अतः हम आप पर ईमान नहीं लायेंगे।) (ऐ रसूल !) आप कह दीजिये कि जो जिबरील का दुश्मन है (वह वास्तव में अल्लाह का दुश्मन है) क्योंकि उसने अल्लाह के आदेश से तुम्हारे हृदय पर क़ुरआन उतारा है। (वह क़ुरआन) जो अपने से पूर्व की आसमानी किताबों की पुष्टि करता है तथा मोमिनों के लिए मार्गदर्शन व ख़ुश-ख़बरी का आधार है।

98. जो भी, अल्लाह का, उसके फ़रिश्तों का, उसके रसूलों का और जिबरील व मीकाईल का शत्रु है (वह काफिर है और जानलो कि) अल्लाह काफ़िरों का शत्रु है।

99. और निःसंदेह हमने आपके पास स्पष्ट निशानियाँ भेजीं तथा व्यभिचारी लोगों के अतिरिक्त कोई भी उनका इनकार नहीं करेगा।

100. क्या ऐसा नहीं है कि जब भी (यहूदियों) ने (अल्लाह व पैग़म्बर से) कोई प्रतिज्ञा की तो उनमें से एक गिरोह ने उसको तोड़ दिया, बल्कि वास्तविक्ता तो यह है कि इनमें से अधिकाँश लोग ईमान नहीं लाये।
विषय सूची

101. और जब उनके पास अल्लाह की ओर से ऐसा रसूल (पैग़म्बरे इस्लाम स.) आया, जो उनके पास मौजूद चीज़ (तौरात) की पुष्टी करने वाला है, तो अहले किताब में से कुछ लोगों ने अल्लाह की किताब को इस तरह अपने पीछे फेंक दिया जैसे वह उसे जानते ही न हों।

102. और यहूदी उस (जादू) का अनुसरण करने लगे जिसे शैतान, सुलेमान के समय में जपा करते थे और सुलेमान ने कभी भी (जादू को नहीं अपनाया और वह) काफ़िर नहीं हुए, लेकिन शैतानों ने कुफ़्र किया कि वह लोगों को जूदू की शिक्षा देते थे और जो हारूत व मारूत नामक दो फ़रिश्तों पर बाबुल शहर में नाज़िल हुआ था, (उसका भी अनुसरण किया, वह लोगों को जादू को विफल बनाने की शिक्षा देते थे) और वह उस समय तक किसी को कोई चीज़ नहीं सिखाते थे जब तक यह न कह दें कि हम तुम्हारे परखे जाने की कसौटी हैं, (जादू पर क्रियान्वित हो कर) काफ़िर न बनों। (और इस ज्ञान का ग़लत प्रयोग न करो) लेकिन वह इन दो फ़रिश्तों से वह चीज़ें सीखते थे जिनके द्वारा पति व पत्नी के मध्य दूरी पैदा कर सकें, (न यह कि उस ज्ञान को जादू को निष्क्रिय बनाने हेतू प्रयोग करते) लेकिन जब तक अल्लाह न चाहे वह किसी को कोई नुक्सान नहीं पहुँचा सकते। उन्होंने उन बातों को सीखा जिनमें उनके लिए नुक़्सान था, लाभ नहीं था तथा वह निश्चित रूप से जानते थे कि जो इस प्रकार का माल खरीदता है उसका परलोक में कोई हिस्सा नहीं होता और वास्तव में उन्होंने स्वयं को बुरी चीज़ के बदले में बेंचा, अगर वह कुछ जानते व समझते हों।

103. अगर वह ईमान ले आते और मुत्तक़ी बन जाते तो अल्लाह के पास (इसका) जो बदला है वह उनके लिए उचित था, अगर वह जानते।

104. ऐ ईमान लाने वालों (पैग़म्बर स.) से राईना (हमारी रिआयत करो) न कहा करो (बल्कि इसके स्थान पर) उनज़ुरना (हमारा ध्यान रखों।) कहा करो और (इस नसीहत को ग़ौर से) सुनो और काफिरों के लिए दुखद अज़ाब है।

105. अहले किताब में से काफिर लोग तथा मुशरेकीन, यह नहीं चाहते कि तुम्हारे रब की ओर से तुम पर कोई ख़ैर नीचे उतरे, जबकि अल्लाह जिसे चाहता है उसे अपनी रहमत के लिए मख़सूस कर लेता है, अल्लाह बहुत प्रतिष्ठावान है।

106. हम जिस (हुक्म और) आयत को निरस्त करते हैं या उसके नज़िल करने में देर करते हैं तो उससे उचित या उसी के समान आयत ले आते हैं, क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह हर कार्य करने में सक्षम है?

107. क्या तुम नहीं जानते कि ज़मीन व आसमानों का शासन केवल अल्लाह से संबंधित है ? (और उसे यह अधिकार है कि वह अपने शासन की आवश्यक्तानुसार क़ानूनों व आदेशों में परिवर्तन करे) और अल्लाह के अतिरिक्त कोई तुम्हारा संरक्षक व सहायक नहीं है।

108. क्या तुम यह चाहते हो कि अपने पैग़म्बर से उसी प्रकार प्रश्न करो, जिस तरह इससे पहले (बनी इस्राईल द्वारा) मूसा से किये गये थे और जो भी (इन बहानो के आधार पर ईमान से भागे या) ईमान को कुफ़्र से बदले, निःसंदेह वह सिराते मुस्तक़ीम से भटक गया है।

109. अधिकाँश अहले किताब (केवल यही नहीं कि स्वयं ईमान नहीं लाते बल्कि उन) के अन्दर जो ईर्ष्या पाई जाती है उसके कारण वह यह चाहते हैं कि तुम्हें भी ईमान के बाद कुफ़्र की ओर पलटा दें, जबकि (इस्लाम व क़ुरआन का) हक़ होना उनके समक्ष सिद्ध हो चुका है, लेकिन तुम (उनकी ईर्ष्या को) अन देखा करते हुए उन्हें क्षमा कर दो यहाँ तक कि अल्लाह अपना आदेश भेजे, निःसंदेह अल्लाह हर कार्य करने में सक्षम है।

110. नमाज़ पढ़ो और ज़कात दो तथा जो नेकी तुम अपने लिए पहले से भेज दोगे उसे (परलोक) में अल्लाह के पास से प्राप्त करोगे, निःसंदेह जो कार्य तुम कर रहे हो अल्लाह उन्हें देखने वाला है।

111. उन्होंने कहा कि यहूदियों व ईसाईयों के अतिरिक्त कोई अन्य जन्नत में नहीं जा सकता, यह उनकी इच्छा मात्र है, आप उनसे कह दीजिये कि अगर तुम सत्य हो तो (इस संबंध) में अपना कोई तर्क प्रस्तुत करो।

112. हाँ, जो अपना चेहरा अल्लाह की ओर कर दे और वह नेक कार्य करने वाला भी हो तो उसका बदला उसके रब के पास है और न उन्हें कोई डर है और न वह दुःखी होते हैं।

113. यहूदी कहते हैं कि ईसाई हक़ पर नहीं हैं और ईसाई कहते हैं कि यहूदी हक़ पर नहीं हैं, जबकि वह (दोनो ही) आसमानी किताब पढ़ते हैं ! इसी तरह न जानने वाले लोग (जैसे मशरिक जिन्हें किताब के बारे में कोई ज्ञान ही नहीं है।) भी उन्हीँ जैसी बाते करते हैं। बस वह जिस बात पर झगडते हैं, उसमें अल्लाह क़ियामत के दिन उनके बीच फैसला करेगा।

114. उससे बड़ा अत्याचारी कौन हो सकता है, जो अल्लाह की मस्जिदों में उसका नाम लेने से रोके और उनको ध्वस्त करने की कोशिश करे, उनके लिए केवल यही है कि डरते हुए मस्जिद में प्रवेश करें, उनके लिए दुनिया में अपमान और परलोक में बहुत बड़ा अज़ाब है।

115. पूरब व पश्चिम (दोनों ही) अल्लाह के हैं, बस तुम जिधर भी रुख कर लो वहीँ अल्लाह का चेहरा (मौजूद) है,निःसंदेह अल्लाह (हर स्थान पर) व्याप्त व हर चीज़ का जानने वाला है।

116. और (कुछ अहले किताब व मुशरिक) कहते हैं कि अल्लाह के संतान है!, (जबकि वह इससे) पाक है, बल्कि जो कुछ ज़मीन व आसमानों में है सब उसी का है और सब उसके आज्ञाकारी हैं।

117. वह ज़मीन व आसमानों को अस्तित्व देना वाला है और जब वह किसी चीज़ को (अस्तित्व में आने) का आदेश देता है तो केवल यह कहता है कि “हो जा” बस वह चीज़ फ़ौरन अस्तित्व में आ जाती है।

118. अज्ञानी लोग, कहते हैं कि अल्लाह हम से स्वयं बात क्यों नहीं करता ? या हमारे पास आयते क्यों नहीं आती ? उनसे पहले लोग भी ऐसी ही बाते कर चुके हैं, इनके दिल (और विचार) आपस में मिलते जुलते हैं, हमने यक़ीन करने वालों के लिए आयतों को (पर्याप्त मात्रा में) स्पष्ट कर दिया है।

119. (ऐ रसूल) हमने आपको हक़ के साथ भेजा ताकि (लोगों) को ख़ुशख़बरी दो और डराओ। आप से जहन्नमी लोगों के बारे में (उनके भटकने व जहन्नम में जाने के संबंध में) कोई प्रश्न नहीं किया जायेगा।

120. (ऐ पैग़म्बर !) यहूदी व ईसाई आप से उस समय तक प्रसन्न नहीं हो सकते जब तक आप (उनकी माँगों को स्वीकार करते हुए) उनके विधान का अनुसरण न करलें, अतः आप कह दीजिये कि हिदायत केवल अल्लाह की हिदायत है और अगर आपने अपने पास ज्ञान (“वही”) के आने के बाद उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया तो न अल्लाह की ओर से आपकी कोई सहायता की जायेगी और न आपको कोई संरक्षण दिया जायेगा।

121. जिन लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी (उनमें से जो लोग) इसे पढ़ने की तरह पढ़ते हैं, वही इस (क़ुरआन या नबी) पर ईमान लाते हैं और जो इस (क़ुरआन या नबी) का इनकार करते हैं, वह सब घाटा उठाने वाले हैं।

122. ऐ इस्राईल की संतान ! मेरे उन उपहारों को याद करो जो मैंने तुम्हें प्रदान किये और तुम्हें पूरे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की।

123. दिन से डरो (जिसमें) कोई किसी से (अल्लाह के अज़ाब में से) किसी चीज़ को नहीं टाल सकेगा, किसी से कोई मुआवज़ा स्वीकार नहीं किया जायेगा, कोई सिफ़ारिश फ़ायदा नहीं पहुँचायेगी और न ही (किसी की ओर से) कोई सहायता की जायेगी।

124. और उस समय को भी याद करो जब इब्राहीम के रब ने विभिन्न प्रकार की घटनाओं के द्वारा उनकी परीक्षा ली और जब उन्होंने इस परीक्षा को अच्छी तरह पूरा किया तो अल्लाह ने उनसे कहा कि हमने आपको इंसानों का इमाम बनाया। इब्राहीम ने कहा कि मेरी संतान में से भी (इमाम बनाना।) अल्लाह ने कहा कि मेरा ओहदा किसी ज़ालिम को नहीं मिलेगा (अर्थात आपकी संतान में से जो लोग पाक व मासूम होंगे उनको यह ओहदा मिल जायेगा।)

125. और उस समय को भी याद करो जब हमने ख़ाना -ए- काबा को इंसानों के एकत्र होने की जगह व शान्ति का केन्द्र बनाया और (कहा कि) इब्राहीम की जगह से नमाज़ के लिए स्थान का चुनाव करो और हमने इब्राहीम व इस्माईल को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वह मेरे घर को तवाफ़, एतेकाफ़, रुकूअ और सजदा करने वालों के लिए पाक करें।

126. और उस समय को भी याद करो जब इब्राहीम ने दुआ की कि पालने वाले ! इस बस्ती को शान्ति पूर्ण बना दे और इसके उन वासियों को जो अल्लाह और क़ियामत पर ईमान ले आये हैं विभिन्न प्रकार के फलों से रिज़्क़ (जीविका) प्रदान कर। (लेकिन अल्लाह ने) कहा कि जो लोग काफ़िर होंगे हम उन्हें (भी) थोड़े उपहार देंगे, इसके बाद उन्हें ज़बरदस्ती जहन्नम के अज़ाब में धकेल देंगे और यह कितना बुरा अन्त है।

127. और उस समय को याद करो जब इब्राहीम, इस्माईल के साथ काबे की दीवारों को ऊँचा कर रहे थे (तो उनकी ज़बान पर यह दुआ थी) पालने वाले (हमारे इस कार्य को) स्वीकार कर ले, निः संदेह तू सुनने और जानने वाला है।

128. (इब्राहीम व इस्माईल इस तरह दुआ कर रहे थे) पालने वाले ! हम दोनों को अपना मुसलमान व आज्ञाकारी बना दे और हमारी संतान में भी ऐसा गिरोह पैदा कर जो तेरा आज्ञाकारी हो तथा हमें इबादत के तरीक़ों से परिचित करा दे और हमारी तौबा को स्वीकार कर ले, निः संदेह तू अत्याधिक तौबा स्वीकार करने वाला और दयावान है।

129. पालने वाले ! उनके बीच उन्हीं में से एक को रसूल बना, ताकि वह उनके सामने तेरी आयतों की तिलावत करे और उन्हें किताब व हिकमत (बुद्धिमता) की शिक्षा दे और उनको (समस्त बुराईयों से) पवित्र करे, निः संदेह तू शक्तिमान व हकीम (बुद्धिमान) है।

130. और कौन है जो मिल्लते इब्रहीम से मूँह मोड़े, मगर यह कि स्वयं को ही मूर्ख बनाये। निःसंदेह हमने उन्हें (इस) दुनिया में चुन लिया है और वह परलोक में नेक लोगों में हैं।

131. (उस समय को भी याद करो) जब इब्राहीम के रब ने उनसे कहा कि स्वयं को मेरे हवाले कर दो तो उन्होंने कहा कि मैंने समस्त लोकों के पालनहार के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया।

132. और इब्राहीम व याक़ूब ने अपनी संतान को वसीयत की कि ऐ मेरे बच्चो! निःसंदेह अल्लाह ने तुम्हारे लिए धर्म (एकेश्वरवाद) को चुना है। बस तुम इसी धर्म का अनुसरण करते हुए मरना।

133. (ऐ यहूदियों) क्या तुम याक़ूब की मृत्यु के समय उपस्थित थे? जब उन्होंने अपने बेटों से प्रश्न किया था कि मेरे बाद तुम किसकी इबादत करोगे ? उन्होंने कहा कि आपके ख़ुदा की और आपके पूर्वज इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ के ख़ुदा की जो कि एक है और हम सब उसी को स्वीकार करते हैं।

134. यह क़ौम थी जो जा चुकी है, उसने जो किया वह उससे सम्बन्धित है और तुमने जो किया वह तुम से सम्बन्धित है, उनके कार्यो के बारे में तुम से कोई प्रश्न नहीं किया जायेगा।

135. वह (अहले किताब) कहते हैं कि यहूदी या ईसाई हो जाओ ताकि तुम्हें हिदायत प्राप्त हो जाये। आप कह दीजिये कि (ऐसा नहीं है) बल्कि इब्राहीम के रास्ते का (अनुसरण) हिदायत का आधार हैं। (क्योकि) वह मुशरिकों में से नहीं थे।

136. ऐ मुसलमानो ! आप कह दीजिये कि हम अल्लाह पर और जो हमारे पास भेजा गया है उस पर तथा जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब, असबात मूसा, ईसा और अन्य पैग़म्बरों पर अल्लाह की ओर से नाज़िल हुआ है ईमान ले आये हैं। हम नबियों में भेद भाव नहीं करते और अल्लाह को स्वीकार करते हैं।

137. अगर वह भी तुम्हारी तरह ईमान ले आयेगें तो हिदायत पा जायेंगे और अगर (इससे) मुँह मोड़ेंगे तो यह दुश्मनी के अतिरिक्त कुछ नहीं है, बस अल्लाह जल्दी ही उनके उपद्रव को आप से दूर करेगा, वह सुनने वाला और जानने वाला है।

138. रंग तो बस अल्लाह का ही रंग है और अल्लाह से अच्छा किस का रंग हो सकता है ? और हम सब केवल उसी की इबादत करते हैं।

139. (ऐ पैग़म्बर ! आप अहले किताब से) कह दीजिये कि क्या तुम हम से अल्लाह के बारे में झगड़ते हो ? जबकि वह हमारा भी रब है और तुम्हारा भी, हमारे कार्य हमारे लिए व तुम्हारे कार्य तुम्हारे लिए है और हम तो उसकी निःस्वार्थ इबादत करते हैं।

140. या कहते हैं कि इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ व याक़ूब और अस्बात यहूदी या ईसाई थे। आप कह दीजिये कि तुम अधिक जानते हो या अल्लाह ? (तुम वास्तविक्ता को क्यों छिपा रहे हो ?) और उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जिसके पास (पैग़म्बर के संबन्ध में) अल्लाह की गवाही मौजूद हो और वह उसे छिपा ले और तुम जो कार्य कर रहे हो अल्लाह उससे अनभिज्ञय नहीं है।

141. वह उम्मत गुज़र चुकी है, उन्होंने जो कमाया वह उनके लिए है और तुमने जो कमाया वह तुम्हारे लिए है, उन्होंने जो किया उसके बारे में तुम से कोई प्रश्न नहीं किया जायेगा।

142. जल्दी ही, कुछ मूर्ख इंसान यह कहेंगे कि उन (मुसलमानों) को इस क़िबले (बैतुल मुक़द्दस) से किस ने मोड़ दिया जिस पर वह पहले थे ? आप कह दीजिये कि पूरब व पश्चिम अल्लाह के हैं, वह जिसे चाहता है उसका सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करता है।

143. और इसी प्रकार हमने तुम्हें उम्मते वसत बनाया ताकि तुम इंसानों पर गवाह रहो और पैग़म्बर तुम पर गवाह रहें तथा हमने उस क़िबले को जिस पर तुम थे केवल इस लिए बदला है ताकि यह पता लगायें कि पैग़म्बर का अनुसरण कौन करता है और पीछे (मूर्खता) की ओर कौन पलटता है। जबकि, जिन लोगों की अल्लाह ने हिदायत की है उनके अतिरिक्त अन्य लोगों पर क़िबले का परिवर्तन बहुत कठिन था। अल्लाह आपके ईमान (बैतुल मुक़द्दस की ओर जो नमाज़ें पढ़ी हैं) को कदाचित बर्बाद नहीं करेगा। अल्लाह इंसानों पर मेहरबान व रहम करने वाला है।

144. (ऐ पैग़म्बर!) निःसंदेह हम (“वही” के उतरने की प्रतीक्षा में) आसमान की ओर उठे आपके चेहरे को देख रहे हैं, अब हम आपको उस क़िबले की ओर मोड़ रहे हैं जिससे आप खुश रहें, अतः आप अपना रुख़ मस्जिदुल हराम की ओर घुमा लिजिये और (ऐ मुसलमानों) आप जहाँ भी हुआ करें अपने रुख़ को उसकी ओर कर लिया करें और जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी है वह (अच्छी तरह) जानते हैं कि यह आदेश अल्लाह की ओर से है तथा हक़ है और वह जो कार्य करते हैं अल्लाह उनसे अनभिज्ञ नहीं है।

145. (ऐ पैग़म्बर !) अगर आप अहले किताब के सामने समस्त तर्क भी पेश कर दें (तब भी) वह आपके किबले का अनुसरण नहीं करेंगे और आप भी उनके क़िबले का अनुसरण करने वाले नहीं हैं, (जिस तरह) उनमें से कुछ लोग आपस में एक दूसरे के क़िबले का अनुसरण नहीं करते और अगर आप, ज्ञान (वही) के आने के बाद उनकी इच्छाओं का अनुसरण करेंगें तो निःसंदेह ज़ालिमों में से हो जायेंगे।

146. जिन (यहूदी व ईसाई) को हमने किताब दी वह (पैग़म्बरे इस्लाम) को अपने बेटों की तरह पहचानते हैं। निःसंदेह उनमें से कुछ लोग हक़ को जनते हुए भी उसे छिपा रहे हैं।

147. हक़ (वह चीज़ है) जो आपके रब की ओर से है, अतः आप शक करने वालों में न हो जाना।

148. प्रत्येक के लिए एक क़िबला है, वह जिसकी ओर चेहरा करता है (अतः तुम क़िबले के बारे में बहस न करो बल्कि इसके स्थान पर) अच्छे कार्य करने में एक दूसरे से आगे बढ़ो (और जानलो कि) तुम जहाँ भी होंगे, अल्लाह तुम सबको (महशर) में उपस्थित करेगा। निःसंदेह अल्लाह हर कार्य करने में सक्षम है।

149. और (ऐ पैग़म्बर) आप जहाँ से भी (यात्रा के निश्चय से) बाहर निकलें (नमाज़ के समय) अपने चेहरे को मस्जिदुल हराम की ओर कर लिया करें, यह आपके रब की ओर से हक़ पर आधारित आदेश है और आप जो कुछ करते हैं अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं है।

150. और (ऐ पैग़म्बर) आप जहाँ से भी बाहर निकले (नमाज़ के समय) अपने चेहरे को मस्जिदुल हराम की ओर कर लिया करें और (ऐ मुसलमानों) तुम भी जहाँ रहो अपने चेहरे को मस्जिदुल हराम की ओर कर लिया करो ताकि आत्याचारियों के अतिरिक्त किसी अन्य इन्सान के तुम से झगड़े की संभावना न रहे, बस तुम उनसे न डरो केवल मुझ से डरो और (जानलो कि क़िबले को इस लिए बदला गया है ताकि) मैं तुम पर अपनी नेअमतों को पूरा करूँ और शायद तुम हिदायत पा जाओ।

151. जिस तरह हमने (तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए) तुम्हारे पास, तुम ही में से एक रसूल भेजा, ताकि वह तुम्हारे सम्मुख हमारी आयतों को पढ़े, तुम्हें बुराईयों से पाक करे, तुम्हें किताब व हिकमत (बुद्दिमता) की शिक्षा दे और तुम्हें वह भी बताये जिसे तुम जान नहीं सकते थे।

152. अतः तुम हमें याद करो ताकि हम तुम्हें याद रखें और हमारा शुक्र करो व कुफ़्र न करो।

153. ऐ ईमान लाने वालो! (जीवन की कठिन परिस्थितियों में) सब्र व नमाज़ से सहायता प्राप्त करो, निःसंदेह अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।

154. जो अल्लाह के मार्ग में क़त्ल होते हैं, उन्हें मुर्दा न कहो, बल्कि वह जीवित हैं, लेकिन तुम नहीं समझ पाते हो।

155. और हम डर, भूक, जान व माल के नुक़्सान और फसलों में कमी के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेंगें, आप (इन विपत्तियों में) सब्र करने वालों को ख़ुश ख़बरी सुना दीजिये।

156. (साबिर) वह हैं, जो विपत्ति पड़ने पर कहते हैं कि हम अल्लाह के लिए ही हैं और उसी की ओर पलट कर जाने वाले है।

157. उनके लिए उनके रब की ओर से सलवात और रहमत है और वही हिदायत पाने वाले हैं।

158. निःसंदेह सफ़ा व मरवः अल्लाह की निशानियों में से हैं, अतः जो भी अल्लाह के घर का हज या उमरा करे उसके द्वारा इन दोनों के चक्कर लगाने में कोई आपत्ति नहीं है और जो (वाजिब कार्यो के अतिरिक्त) कोई अन्य नेक कार्य करे तो अल्लाह निःसंदेह शुक्र करने वाला और जानने वाला है।

159. हमारे द्वारा इंसानों के लिए किताब में वर्णन कर देने के बाद भी जो लोग उस चीज़ को छिपाते हैं, जिसे हमने स्पष्ट दलीलों व हिदायत के साधनों में से नाज़िल किया है, उन पर अल्लाह भी लानत करता है और समस्त लानत करने वाले भी लानत करते हैं।

160. उन लोगों के अतिरिक्त जिन्होंने तौबा की और (अपने बुरे कार्यो को अच्छे कार्यो के द्वारा) सुधारा तथा (जिस चीज़ को छिपाया था) उसे प्रकट किया, मैं उन पर (अपनी कृपा) को वापस पलटा दूँगा क्योंकि मैं तौबा को स्वीकार करने वाला व दयावान हूँ।

161. जो लोग काफ़िर हो गये और कुफ़्र की हालत में ही मर गये, उन पर अल्लाह की, फ़रिश्तों की और समस्त इंसानों की लानत है।

162. वह सदैव उसी लानत में रहेंगे, न उनके अज़ाब में कमी होगी और न उन्हें मोहलत दी जायेगी।

163. तुम्हारा ख़ुदा बस एक है, उसके अतिरिक्त कोई ख़ुदा नहीं है, वह रहमान भी है और रहीम भी।

164. निःसंदेह आसमानों व ज़मीन की रचना में और रात व दिन के बदलने में और इंसानों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए समुन्द्र में तैरती हुई किश्तियों में और उस पानी में जिसे अल्लाह ने आसमान से बरसा कर मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा किया और उसमें तरह तरह के चौपाये फैला दिये और हवाओं के चलने में और ज़मीन व आसमान के मध्य स्थित बादलों में, बुद्धीजीवियों के लिए निशानियाँ है।

165. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना ख़ुदा चुनते हैं और उनसे अल्लाह के समान मुहब्बत करते है, लेकिन जो लोग ईमान ले आये हैं, अल्लाह से उनकी मुहब्बत (मुशरिकों द्वारा अपने बनाये हुए ख़ुदाओं से की जाने वाली मुहब्बत से) अत्याधिक है। वह लोग (जिन्होंने बुतो की पूजा करके) अपने ऊपर ज़ुल्म किया, जब अपने अज़ाब को देखेंगे तो समझेंगे कि समस्त शक्ति अल्लाह के पास है और अल्लाह कठिन अज़ाब करने वाला है।

166. जब वह अज़ाब देखेंगे और उनसे हर चीज़ का सम्बन्ध टूट जायेगा तो कुफ़्र के मार्गदर्शक अपने अनुयायियों से घर्णा करेंगे।

167. (उस समय) उनका अनुसरण करने वाले कहेंगे कि काश हमारे लिए यह अवसर होता कि (हम संसार में पलट जाते) और इनसे इसी तरह नफ़रत करते जिस तरह यह (आज) हमसे नफ़रत कर रहे हैं, इस तरह अल्लाह उनके कार्यो को उनके सामने पश्चात्ताप के रूप में प्रस्तुत करेगा और उनमें से कोई भी जहन्नम से निकलने वाला नहीं है।

168. ऐ इंसानों ! ज़मीन में जो भी पाक व हलाल चीज़ें हैं, उन्हें खाओ और शैतान के क़दमों पर क़दम न रखो, निःसंदेह वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।

169. निःसंदेह वह (शैतान) तुम्हें बुराई व अश्लीलता का आदेश देता है और अल्लाह के संबंध में अज्ञानता पर आधारित बातें करने का भी।

170. और जब उन (मुशरिकों) से कहा जाता है कि जो अल्लाह ने नाज़िल किया है उसका अनुसरण करो तो कहते हैं कि हम तो उसका अनुसरण करते है, जिसका अनुसरण हमारे बाप दादा किया करते थे, तो क्या यह (उसी का अनुसरण करेंगे) चाहे इनके बाप दादा मंदबुद्धी और गुमराह ही रहे हों।
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अयत 171-232
सूरए बक़रा का अनुवाद
 

अयत 171-232

171. काफ़िरों की मिसाल ऐसी है, जैसे कोई जानवर को पुकारे जो क़रीब या दूर की आवाज़ के अतिरिक्त कुछ नहीं सुनता, यह काफ़िर बहरे, गूँगे व अंधे हैं इसी कारण बुद्धी से काम नहीं लेते।

172. ऐ ईमान लाने वालो ! हमने तुम्हें जो पाक रिज़्क़ दिया है उसे खाओ और अल्लाह का शुक्र करो, अगर तुम केवल उसी की इबादत करते हो।

173. बस, अल्लाह ने तुम्हारे ऊपर मुर्दार, ख़ून, सूवर के गोश्त और जिस (जानवर को) अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर ज़ब्ह किया गया हो हराम किया है। (लेकिन) जो (इनको खाने पर) मजबूर हो जाये और ज़्यादा चाहने वाला व ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग करने वाला न हो तो उसके लिए कोई गुनाह नहीं है, निःसंदेह अल्लाह क्षमा करने वाला और दयावान है।

174. जो लोग अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब की (बातों) को छिपाते हैं और उसे थोड़ी क़ीमत पर बेंच देते हैं, वह सब अपने पेट में आग भरते हैं, अल्लाह क़ियामत के दिन उनसे बात नहीं करेगा और न ही उन्हें पाक करेगा और उनके लिए दुःखद अज़ाब है।

175. यह (वास्तविक्ता को छिपाने वाले लोग), वह हैं, जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही को और क्षमा के बदले अज़ाब को ख़रीदा है, वह लोग अल्लाह के अज़ाब पर किस प्रकार सब्र करेंगे ?

176. यह (अज़ाब) इस लिए है कि अल्लाह ने किताब को हक़ के साथ नाज़िल किया और निःसंदेह जिन लोगों ने (हक़ को छिपाकर व किताब में परिवर्तन करके) किताब में विरोधाभास उत्पन्न किया वह सदैव हक़ से दूर रह कर झगड़ते रहते हैं।

177. अपने चेहरे को (नमाज़ के समय) पूरब या पश्चिम की ओर करना नेकी नहीं है, बल्कि नेक वह है, जो अल्लाह, क़ियामत, किताब, फ़रिश्तों और नबियों पर ईमान लाये और (अपने) माल को उसकी मुहब्बत में रिश्तेदारों, यतीमों, दरिद्रों, मुसाफ़िरों, फ़क़ीरों और ग़ुलामों को आज़ाद कराने पर ख़र्च करे और नमाज़ पढ़ें, ज़कात दे, अपने किये हुए वादे को पूरा करे, कठिनाईयों, बीमारियों और जंग के मैदान में सब्र करे, यही वह लोग हैं जिन्होंने सच बोला (इनकी करनी कथनी व आस्था समान हैं) और यही लोग मुत्तक़ी हैं।

178. ऐ ईमान लाने वालो ! क़त्ल के संबंध में क़िसास (का क़ानून) तुम्हारे लिए इस प्रकार निश्चित किया गया है कि आज़ाद के बदले आज़ाद, ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम, स्त्री के बदले स्त्री, अब अगर किसी को अपने (दीनी) भाई (अर्थात मृतक के वारिस की ओर) से माफ़ी मिल जाये (या उसका क़िसास खूनबहा में बदल जाये) तो अच्छाई का अनुकरण करे और भलाई के साथ (दियत मृतक के वारिस) को अदा करे। यह हुक्म तुम्हारे रब की ओर से छूट व रहमत है, अब अगर कोई इस (हुक्म) के बाद भी ज़्यादती करेगा तो उसके लिए दुःखद अज़ाब है।

179. ऐ बुद्धीजीवियो ! तुम्हारे लिए क़िसास में जीवन है, शायद तुम (इस प्रकार) मुत्तक़ी बन जाओ।

180. तुम्हारे ऊपर वाजिब कर दिया गया कि जब तुम में से किसी के सामने मौत (की निशानियाँ) आजायें, तो अगर तुमने माल छोड़ा है, तो (उसके लिए) अपने माँ बाप और रिश्तेदारो को उचित रूप से वसीयत करो, यह काम एक तरह से मुत्तक़ीन पर हक़ है।

181. बस जो (वसीयत) सुनने के बाद उसे बदल दे, तो उसका गुनाह केवल बदलने वालों पर है, अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।

182. बस अगर किसी को वसीयत करने वाले से अनुचित पक्षपात या गुनाह (बुरे कार्यो के लिए वसीयत) का डर हो और वह उनके बीच सुलह करादे तो उस पर कोई गुनाह नहीं है (अर्थात वसीयत को बदलने के अपराध में उसे सज़ा नहीं मिलेगी) निःसंदेह अल्लाह क्षमा करने वाला व दयावान है।

183. ऐ ईमान लाने वालों ! तुम पर रोज़े उसी तरह वाजिब किये गये हैं, जिस तरह तुम से पहले लोगों पर वाजिब किये गये थे, शायद तुम इस तरह मुत्तक़ी बन जाओ।

184. कुछ गिने चुने दिनों के लिए ही (तुम पर रोज़े वाजिब किये गये हैं) लेकिन अगर तुम में से कोई (रमज़ान में) बीमार हो या यात्रा पर हो तो (वह उतने ही दिन) अन्य दिनों में (रोज़े रखे) और जो लोग रोज़ा रखने में असमर्थ हैं, (जैसे पुराने बीमार या बूढ़े स्त्री पुरूष) उनके लिए ज़रूरी है कि वह दण्ड दें, दरिद्र को भोजन कराये और जो अपनी मर्ज़ी से अधिक भलाई करे (अर्थात वाजिब मात्रा से अधिक खाना खिलाये) तो यह उसके लिए अधिक श्रेष्ठ है। अगर तुम (रोज़े के प्रभावों से) परिचित हो जाओ तो (समझलो कि) रोज़ा रखना तुम्हारे लिए श्रेष्ठ है। (फिर मजबूर लोगों को बिना रोज़े देख कर उनके समान रहने की इच्छा न करो।)

185. रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया (और क़ुरआन वह किताब है) जो इंसानों की हिदायत (मार्गदर्शन) करती है और इसमें हिदायत व हक़ (सत्य) को बातिल (असत्य) से अलग करने की स्पष्ट दलीलें हैं, अतः तुम में से जो इस महीने में हाज़िर रहे उसे रोज़ा रखना चाहिए और जो बीमार या मुसाफ़िर हो उसे उतनी ही संख्या में अन्य दिनों में रोज़े रखने चाहिए, अल्लाह तुम्हारे लिए सरला चाहता है कठिनाई नहीं चाहता और (यह क़ज़ा रोज़े) इस लिए हैं कि तुम निश्चित संख्या को पूरा करो और अल्लाह द्वारा प्रदान हिदायत पर उसको महानता के साथ याद करो और शायद तुम इस प्रकार शुक्र करने वाले बन जाओ।

186. और जब मेरे बंदे, आपसे मेरे बारे में पूछें (तो कह दीजिये कि) मैं क़रीब हूँ, जब दुआ करने वाला मुझे पुकारता है तो मैं जवाब देता हूँ। बस उन्हें चाहिए कि मेरे निमन्त्रण को स्वीकार करें और मुझ पर ईमान लायें, शायद वह इस प्रकार प्रगति कर सकें।

187. रोज़े (रमज़ान) की रातों में तुम्हारे लिए अपनी पत्नी के साथ संभोग करना हलाल कर दिया गया है। वह तुम्हारे लिए वस्त्र (समान) हैं और तुम उनके लिए वस्त्र (समान) हो। अल्लाह जानता है कि तुम स्वयं से विश्वासघात करते थे (तुम्हें जिस संभोग से रोका गया था, तुम में से कुछ उसमें लिप्त थे) अतः अल्लाह ने तुम्हारी तौबा को स्वीकार कर लिया और तुम्हें क्षमा कर दिया। अब तुम उनके साथ संभोग कर सकते हो और अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो निश्चित किया है, उसे ले सकते हो और तुम रात में उस समय तक खाओ पियो जब तक सुबह का काला डोरा सफेद डोरे से प्रकट न हो जाये(अर्थात सुबह की सफ़ेदी प्रत्यक्ष न हो जाये) फिर अपने रोज़े को रात तक पूरा करो और तुम मस्जिद में एतेकाफ़ की अवस्था में पत्नियों से संभोग न करो। यह अल्लाह की हदें व क़ानून हैं, अतः तुम (गुनाह के इरादे से) उनसे समीप न हों। अल्लाह अपनी आयतों को इंसानों के लिए इसी प्रकार स्पष्ट करता है, शायद वह मुत्तक़ी बन जायें।

188. तुम आपस में एक दूसरे के माल को बातिल (अनुचित) रूप से न खाओ और अन्य लोगों का कुछ माल गुनाह के साथ खाने के लिए माल को हाकिमों की जेब में (रिश्वत के रूप में) न भरो, जबकि तुम स्वयं जानते हो कि (ग़लत कर रहे हो।)

189. वह लोग आपसे हर महीने के चाँद के (रहस्य) के बारे में प्रश्न करतेहैं, आप उनसे कह दीजिये कि यह इस लिए है ताकि लोग अपने कार्यो (के समय) व हज्ज के ज़माने को पहचाने। (ऐ पैग़म्बर आप उनसे कह दीजिये) कि (हज्ज का एहराम बाँधने के बाद) घरों में पीछे की ओर से प्रवेश करने में कोई अच्छाई नहीं है, बल्कि तक़वे को अपनाने और घरो में उनके दरवाज़ों से प्रवेश करने में ही अच्छाई है और अल्लाह से डरो शायद तुम इस प्रकार सफल हो सको।

190. जो तुम से लड़े, तुम भी उनसे अल्लाह की राह में जंग करो, परन्तु हद से न बढ़ो (क्योंकि) अल्लाह हद से बढ़ने वालों से प्रेम नहीं करता।

191. (वह बुत पूजक जो किसी भी प्रकार का अत्याचार करने से नहीं चूकते) उन्हें जहाँ पाओ क़त्ल कर दो, और जहाँ (मक्के) से उन्होंने तुम्हें निकाला है तुम भी उन्हें निकाल बाहर करो और फ़ित्ना (शिर्क व यातनाएं) क़त्ल से भी बुरा है तथा तुम उनसे मस्जिदुल हराम के पास उस समय तक जंग न करना जब तक वह तुम से जंग न करें और अगर वह तुम से लड़ने लगें तो तुम भी उन्हें (वहीँ) क़त्ल कर देना, काफ़िरों की यही सज़ा है।

192. अगर वह अपने हाथ को रोक लें तो अल्लाह बड़ा क्षमा करने वाला और दयावान है।

193. और उनसे उस समय तक जंग करते रहो जब तक फ़ित्ना (बुत पूजा) समाप्त न हो जाये, और दीन केवल अल्लाह का न रह जाये। फिर अगर वह (अपनी ग़लत शैली) से हट जायें तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी को भी सताना उचित नहीं है।

194. हराम महीने का जवाब हराम महीना है। (अगर दुश्मन हराम महीनों के आदर को भंग करके तुम से लड़ता है तो फिर तुम्हें भी अधिकार है कि तुम भी उनसे वैसा ही मुक़ाबेला करो, क्योंकि) हुरमतों का भी क़िसास (बदला) है और जो भी तुम पर अत्याचार करे तुम भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा अत्याचार उसने किया है और अल्लाह से ड़रो (कि उससे अधिक न करो) और जान लो कि अल्लाह मुत्तक़ियों के साथ है।

195. और अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो (तथा ख़र्च न करके) अपने हाथों से ही स्वयं का वध न करो और अच्छे कार्य करो, अल्लाह अच्छे कार्य करने वालों से मुहब्बत करता है।

196. हज व उमरे को अल्लाह के लिए पूरा करो, अब अगर (हज का एहराम बाँधने के बाद कोई बाधा उत्पन्न हो जाये, जैसे दुश्मन का डर या ऐसी बीमारी जिसकी वजह से हज पूरा न कर सको, अर्थात) तुम घिर जाओ तो जो कुरबानी उपलब्ध हो (ज़ब्ह करो और एहराम की हालत से बाहर निकल जाओ) और अपने सरों को उस समय तक न मुंडवाओं जब तक क़ुरबानी अपनी जगह पर न पहुँच जाये और अगर कोई बीमार हो या किसी के सर में कोई तकलीफ़ हो (और वह अपने सर को जल्दी मुंडवाने पर मजबूर हो) तो उसे चाहिए कि रोज़े, सदक़े या क़ुरबानी के रूप में कफ़्फ़ारा दे, (और जब बीमारी या दुश्मन से) छुटकारा मिल जाये तो जिसने उमरे से हज्जे तमत्तो का इरादा किया है, वह जो भी संभव हो क़ुरबानी दे और अगर क़ुरबानी करना संभव न हो तो तीन रोज़े हज के दौरान और सात रोज़े हज से वापसी पर रखे, इस तरह दस रोज़े पूरे हो जायेंगे। यह (हज्जे तमत्तो) उन लोगो के लिए है, जिनका परिवार मक्के में न रहता हो अर्थात जो मस्जिदुल हराम में हाज़िर न होते हों, अल्लाह से डरते रहो और याद रखो कि अल्लाह का अज़ाब बहुत कठिन है।

197. हज्ज (व उमरे) के लिए कुछ महीने निश्चित है, (शव्वाल, ज़ीक़अदः व ज़िल्हिज्जः) जो इन महीनों में हज्ज के फ़रीज़े को पूरा करे, उसे हज्ज में संभोग, गुनाह, और झगड़े की अनुमति नहीं है और तुम जो भी अच्छा कार्य करोगे अल्लाह उसे जानता है। अपने लिए ज़ादे राह (परलोक की यात्रा के लिए पुण्य जमा करना) तैयार करो और सबसे अच्छा ज़ादे राह तक़वा है और ऐ बुद्धिजीवियों ! केवल मुझ से डरो।

198. अगर तुम (हज्ज के समय) अल्लाह की अनुकम्पा (जीविका प्राप्त करने व व्यापार करने) की तलाश में निकलो, तो तुम पर कोई गुनाह नहीं है। जब तुम अराफ़ात से निकल जाओ तो फिर मशअरिल हराम के पास अल्लाह को याद करो और उसको इस लिए याद करो कि उसने तुम्हारा मार्गदर्शन किया, जबकि तुम इससे पहले भटके हुए लोगों में से थे।

199. फिर समस्त लोगों की तरह तुम भी कूच (प्रस्थान) करो और अल्लाह से माफ़ी माँगो, निःसंदेह अल्लाह अत्याधिक माफ़ करने वाला और दयावान है।

200. जब तुम अपने (हज्ज के) मनासिक समाप्त कर लो तो अल्लाह को उस तरह याद करो, जिस तरह तुम अपने बाप दादा को याद करते हो, बल्कि उससे भी अधिक। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि ऐ पालने वाले ! हमें दुनिया में ही दे दे, उनका परलोक में कोई हिस्सा नहीं है।

201. (लेकिन) कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि पालने वाले हमें संसार और परलोक दोनों में अच्छाई प्रदान कर और हमें जहन्नम के अज़ाब से सुरक्षित रख।

202. यही वह लोग हैं जिनके लिए उनकी कमाई में हिस्सा है और अल्लाह शीघ्र हिसाब करने वाला है।

203. अल्लाह को निश्चित दिनों में याद करो (ज़िल्हिज्जः मास के ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें दिन, यह दिन अय्यामे तशरीक़ के नाम से प्रसिद्ध हैं) और अगर कोई जल्दी करे (व मिना के आमाल को) दो दिन में (पूरा करले तो) उस पर कोई गुनाह नहीं है और अगर कोई देर करे (व आमाल को तीन दिन में पूरा करे तो) उस पर भी कोई गुनाह नहीं है, इस शर्त के साथ कि वह मुत्तक़ी हो, अल्लाह से डरो और याद रखो कि निःसंदेह तुम उसी की ओर पलटाये जाओगे।

204. इंसानों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी सांसारिक जीवन से सम्बन्धित बातें आपको अच्छी लगती हैं और वह अपने दिल की बातों पर अल्लाह को गवाह भी बनाते है (परन्तु वास्तविक्ता यह है कि वह) सबसे बड़े शत्रु हैं।

205. और जब वह हुकूमत प्राप्त कर लेते हैं तो ज़मीन पर उपद्रव फैलाने और खेतियों व नस्लों को बर्बाद करने की कोशिश करते हैं, जबकि अल्लाह उपद्रव को पसंद नहीं करता।

206. जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह से डरो, तो गुनाहों के द्वारा प्राप्त घमंड उनके आड़े आ जाता है, ऐसे लोगों के लिए जहन्नम काफ़ी है, और वह कितना बुरा ठिकाना है।

207. कुछ ऐसे भी इन्सान हैं, जो अपनी जान को अल्लाह की प्रसन्नता के लिए बेंच देते हैं और अल्लाह अपने बंदों पर अत्याधिक मेहरबान है।

208. ऐ ईमान लाने वालो ! तुम सब एकता व मैत्री में प्रविष्ट हो जाओ (और पूर्ण रूप से अल्लाह के सामने समर्पण कर दो) और शैतान के क़दमों पर क़दम न रखो, वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।

209. अगर तुम स्पष्ट दलीलों के आजाने के बाद डगमगा (भटक) गये, तो समझ लो कि अल्लाह अज़ीज़ व हकीम है। अर्थात वह अपनी बुद्धी से काम करता है और कोई शक्ति उसके इरादे में बाधा नहीं बन सकती है।

210. क्या, उन्हें इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रतीक्षा है कि अल्लाह और फ़रिश्ते, बादलों के साये में उनके पास आजायें ताकि फ़ैसला हो सके? (जबकि स्पष्ट दलीलों के आने के बाद किसी अन्य चीज़ की आवश्यक्ता नहीं है) और समस्त कार्य अल्लाह की ओर ही पलटते हैं।

211. बनी इस्राईल से पूछिये कि हमने उनके सामने कितनी स्पष्ट दलीलें प्रस्तुत की हैं ? और जो अल्लाह की नेमत (हिदायत) आजाने के बाद उसे बदल दे, (उसे समझ लेना चाहिए कि) अल्लाह का अज़ाब बहुत कठिन होता है।

212. काफ़िरों के सांसारिक जीवन को सुन्दर बना दिया गया है, (इसी कारण) वह ईमानदारों की मज़ाक़ उड़ाते हैं, जबकि क़ियामत के दिन मुत्तक़ी लोगों का स्थान उनसे ऊँचा है और अल्लाह जिसे चाहता है बिना हिसाब के धन देता है।

213. (आरम्भ में) समस्त इन्सान एक थे, (उनमें कोई मत भेद नहीं था, फिर उनमें परस्पर विरोध उत्पन्न हुआ तो) अल्लाह ने खुशख़बरी सुनाने वाले और डराने वाले नबियों को भेजा तथा उनको हक़ पर आधारित किताब भी दी, ताकि जिस चीज़ पर लोगों में मत भेद हो गया है, वह उसके बारे में फ़ैसला करें। उस (किताब पर) उन्हीं लोगों ने विवाद किया, जिनके लिए यह किताब दी गई थी, वह भी स्पष्ट दलीलों के आजाने के बाद, उस ईर्ष्या के कारण जो उनके अन्दर पाई जाती थी। बस जो ईमान ले आये थे अल्लाह ने मत भेद के संबंध में उनकी हक़ की ओर हिदायत की (और बे ईमान लोग उसी तरह विवाद में उलझे रह गये।) अल्लाह जिसे चाहता है, उसका सिराते मुस्तक़ीम (सीधे रास्ते) की ओर मार्ग दर्शन करता है।

214. क्या तुम यह सोचते हो कि ऐसे ही जन्नत में चले जाओगे, जबकि अभी तक तुम्हारे साथ वह घटित नहीं हुआ है जो तुमसे पहले लोगों के साथ घटित हुआ था, उन्हें विभिन्न विपत्तियों ने घेरा और इतने झटके दिये कि ख़ुद रसूल और उनके साथियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अल्लाह की सहायता कब प्राप्त होगी ? तो जनलो कि अल्लाह की सहायता बहुत समीप है।

215. आपसे से पूछते हैं कि क्या चीज़ इनफ़ाक़ (अल्लाह के लिए ख़र्च) करें ? आप कह दीजिये कि जो माल (चाहो) इनफ़ाक़ करो, माँ बाप के लिए, रिश्तेदारों के लिए, यतीमों के लिए, फ़क़ीरों के लिए और मुसाफ़िरों के लिए और जान लो कि जो भी नेक कार्य करोगे निःसंदेह अल्लाह उसे जानने वाला है।

216. तुम्हारे ऊपर जिहाद वाजिब किया गया और वह तुम्हें पसंद नहीं है, और यह भी हो सकता है कि तुम जिस चीज़ को पसंद न करते हों वह तुम्हारे लिए लाभदायक हो और जिस चीज़ को तुम पसंद करते हो वह तुम्हारे लिए हानिकारक हो, अल्लाह (तुम्हारी भलाई को) जानता है और तुम नहीं जानते।

217. (पैग़म्बर) यह लोग आपसे आदरणीय महीनों के जिहाद के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं, तो आप कह दीजिये कि इन महीनों (ज़ीक़अदः, ज़िल हिज्जः, मुहर्रम व रजब) में जंग करना बहुत बड़ा गुनाह है। परन्तु लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकना और उसका इनकार करना, लोगों को मस्जिदुल हराम से रोकना और वहाँ रहने वालों को वहाँ से बाहर निकालना, अल्लाह के समीप उससे भी बड़ा गुनाह है, (क्योंकि) फ़ित्ना फैलाना तो क़त्ल से भी अधिक भयंकर है। (मुशरिक) तुमसे सदैव लड़ते रहेंगे, यहाँ तक कि अगर उनका बस चले तो वह तुम्हें तुम्हारे दीन से पलटा दें और तुम में से जो लोग अपने दीन से पलट जायें और कुफ़्र की हालत में ही मर जायें, उनके समस्त क्रिया कलाप संसार और परलोक में बर्बाद हो जायेंगे और वह जहन्नमी हैं और सदैव उसी में रहेंगे।

218. निःसंदेह जो लोग ईमान लाये और जिन्होंने हिजरत करके अल्लाह के लिए जिहाद किया, वह अल्लाह की रहमत के उम्मीदवार हैं और अल्लाह क्षमा करने वाला तथा दयावान है।

219. वह आप से शराब व जुए के बारे में पूछते हैं, आप कह दीजिये कि यह दोनों बहुत बड़े गुनाह हैं और इन दोनों में लोगों के लिए (भौतिक) लाभ भी है, लेकिन इन दोनों का गुनाह इनके लाभों से अधिक है। इसी तरह वह आपसे पूछते हैं कि अल्लाह के नाम पर क्या ख़र्च करे ? आप कह दीजिये कि (जो तुम्हारी आवश्यक्ता से) अधिक हो (उसे ख़र्च कीजिये) अल्लाह तुम्हारे सामने इस तरह की आयतों को स्पष्ट करता है ताकि शायद तुम चिंतन करो।

220. (ताकि तुम) संसार व परलोक के बारे में (चिंतन करो) और आप से यतीमों के बारे में पूछते हैं, आप कह दीजिये कि उनके कार्यो को सुधारना बहुत अच्छा है और अगर तुम अपनी ज़िन्दगी को उनकी ज़िन्दगी के साथ मिलालो (तो कोई हरज नहीं है) वह तुम्हारे (दीनी) भाई हैं। अल्लाह, बुराईयाँ फैलाने वालों और सुधारवादियों को पहचानता है और अगर अल्लाह तुम्हें कठिनाईयों में डालना चाहता (तो आदेश देता कि यतीमों का संरक्षण करते समय उनके माल को अपने माल से बिल्कुल अलग रखो, लेकिन अल्लाह ने ऐसा नहीं किया) निःसंदेह वह अज़ीज़ (अजित) व हकीम (बुद्धिमान) है।

221. मुशरिक स्त्रियाँ जब तक ईमान न ले आयें, उनसे शादी न करो, और ईमानदार बांदी, (स्वतन्त्र) मुशरिक औरत से अच्छी है, चाहे (उसकी सुन्दरता या माल या मान सम्मान) तुम्हें आश्चर्य चकित ही क्यों न कर दे। (इसी प्रकार) जब तक मुशरिक मर्द ईमान न ले आयें उनके निकाह में स्त्रियाँ न दो, और मोमिन ग़ुलाम, मुशरिक मर्द से अच्छा है, चाहे (उसकी सुन्दरता या माल या मान सम्मान) तुम्हें ताज्जुब में ही क्यों न डाल दे। वह मुशरिक (तुम्हें) आग की ओर बुलाते हैं, जबकि अल्लाह अपने आदेशों के द्वारा तुम्हें जन्नत और मग़फ़ेरत की तरफ़ बुलाता है और अपनी निशानियों को लोगों के सामने प्रकट करता कि शायद वह समझ लें।

222. और वह आप से हैज़ (स्त्रियों की महावारी) के बारे में पूछते है, आप कह दीजिये कि यह एक दुखः है, अतः तुम हैज़ की हालत में स्त्रियों से बचो और जब तक वह पाक न हो जायें उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित न करो। जब वह पाक हो जायें तो जिस तरह तुम्हें अल्लाह ने हुक्म दिया है उनके साथ सम्बन्ध स्थापित करो। निःसंदेह अल्लाह, पाक व तौबा करने वालों से मुहब्बत करता है।

223. तुम्हारी स्त्रियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं, तुम जब और जहाँ चाहो अपनी खेतियों में प्रवेश करो (अर्थात उनके साथ संभोग करो) और अपने लिए (नेक काम करने में) आगे बढ़ो और अल्लाह से डरो व जानलो कि तुम उससे ज़रूर मिलोगे और मोमिनों को ख़ुश ख़बरी दो।

224. नेकी करने, तक़वा अपनाने और लोगों के बीच मेल मिलाप कराने के लिए अल्लाह की क़सम को सनद न बनाओ, अल्लाह सुनने व जानने वाला है।

225. अल्लाह, तुमसे उन क़समों के बारे में पूछ ताछ नहीं करेगा (जो तुमने बग़ैर इरादे के खाई हैं) परन्तु जो क़समें तुमने दिल से (अपने इरादे व अधिकार के साथ) खाई हैं उनके बारे में तुमसे हिसाब किताब लिया जायेगा और अल्लाह माफ़ करने वाला व बुर्दुबार है।

226. जो लोग (अपनी पत्नियों को सताने के इरादे से) उनके साथ संभोग न करने की क़सम खाते हैं, उनके लिए चार महीने की छूट है, अतः अगर वह (अपनी क़सम को तोड़कर सुलह) की ओर पलट जायें तो (उनके ऊपर कोई चीज़ नहीं है और) निःसंदेह अल्लाह क्षमा करने वाला व दयावान है।

227. और अगर उन्होंने तलाक़ का इरादा कर लिया है (उसकी शर्तों के साथ तो इसमें भी कोई हरज नहीं है) निःसंदेह अल्लाह सुनने व जानने वाला है।

228. तलाक़शुदा महिलाओं को तीन पाकियों तक इन्तेज़ार करना चाहिए (एक वह पाकी जिसमें तलाक़ दी गई है और दो अन्य पाकी, उसके बाद जब उसे तीसरी बार महावारी का ख़ून आये तो उसकी इद्दत पूरी है) और अगर वह अल्लाह व क़ियामत के दिन पर ईमान रखती हैं तो जो चीज़ अल्लाह ने उनके गर्भ में पैदा की है, उनके लिए उसे छिपाना जायज़ नहीं है। अगर इस समय सीमा में उनके पति सुलह करके उन्हें अपने पास वापस बुलाना चाहें तो वह उन पर (अन्य लोगों से) अधिक हक़ रखते हैं। स्त्रियों की जैसी ज़िम्मेदारियाँ हैं वैसे ही उनके अधिकार भी हैं।

229. तलाक़ (तलाक़े रजई, जिसमें पत्नी को दोबारा अपनाना संभव है, अधिक से अधिक) दो बार है। अतः (हर बार) या तो अपनी पत्नी को अच्छी तरह रखे व (उससे मेल करले) या फिर उसे उचित रूप से छोड़ कर (उससे अलग हो जाये) और तुम्हारे लिए जायज़ नहीं है कि जो चीज़ तुमने अपनी पत्नियों को दे दी है, उनसे वापस लो इस स्थिति के अतिरिक्त कि अगर दोनों को यह डर हो कि अल्लाह की हुदूद को बाक़ी नहीं रख सकेंगे, अगर तुम्हें यह भय पैदा हो जाये कि दोनों अल्लाह की हुदूद को बक़ी न रख सकेंगे तो इसमें कोई बाधा नहीं है कि स्त्री पुरूष को फ़िदया देकर (तलाक़े ख़ुल्अ लेलें) यह अल्लाह की हुदूद हैं इनका उलंघन न करना और जो अल्लाह की हुदूद का उलंघन करेगा वह अत्याचारी है।

230. अगर (दो तलाक़ व दो रुजूऊ के बाद तीसरी बार) उसे तलाक़ दे दी तो वह पत्नी उस पर हलाल नहीं होगी, लेकिन अगर वह किसी अन्य मर्द से शादी करले (और वह उसके साथ संभोग करे) फिर अगर (दूसरा पति) उसे तलाक़ देदे तो एक दूसरे की तरफ़ पलटने में कोई हरज नहीं है (अर्थात इस स्थिति में वह औरत अपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है) मगर इस स्थिति में कि उन दोनों को उम्मीद हो कि अल्लाह के क़ानून की रिआयत होगी और यह अल्लाह की हुदूद हैं जिनका वर्णन अल्लाह ज्ञानियों से करता है।

231. जब तुम पत्नियों को तलाक़ दे दो और उनका (इद्दत का) समय समाप्ति पर पहुँचे तो या उन्हें अच्छी तरह से अपने पास रख लो (अर्थात उनसे मेल कर के उन्हें अपना लो) या फिर उन्हें उचित रूप से छोड़ दो और (यह भी याद रहे कि) उन्हें यातना देने व अत्याचार करने के (उद्देश्य से) अपने पास न रखना और अगर किसी ने ऐसा किया तो (समझो कि) उसने स्वयं पर अत्याचार किया तथा अल्लाह की आयत का कदाचित मज़ाक़ न उड़ाना। अल्लाह ने तुम्हें जो उपहार दिये है और किताब व हिकमत (बुद्धिमता) में से जो कुछ तुम पर नाज़िल किया है और उसके द्वारा तुम्हें जो नसीहत की है उन सबको याद करो तथा अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है।

232. जब तुम अपनी पत्नियों को तलाक़ दे दो और उनकी (इद्दत) का समय समाप्त होने पर हो तो अगर वह अपने (पहले) पतियों से शादी करना चाहे तो इसमें रुकावट न डालो, जबकि उनके बीच उचित रूप से समझौता हो जाये। तुम में से जो अल्लाह व क़ियामत के दिन पर ईमान रखता है उसे इन आदेशों के द्वारा नसीहत की जाती है। इस की (रिआयत में) तुम्हारी अधिक पाकी व सफ़ाई है, अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते हो।




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