तीन पुर मअना अहादीस! |


तीन पुर मअना अहादीस!
तीन पुर मअना अहादीस!
  1- हक़ किसके साथ है


ज़ोजाते पैगम्बरे इस्लाम (स.) उम्मे सलमा और आइशा कहती हैं कि हमने पैगम्बरे इस्लाम (स.) से सुना है कि उन्हो फ़रमाया “अलीयुन मअल हक़्क़ि व हक़्क़ु मअल अलीयिन लन यफ़तरिक़ा हत्ता यरदा अलय्यल हौज़”



तर्जमा – अली हक़ के साथ है और हक़ अली के साथ है। और यह हर गिज़ एक दूसरे से जुदा नही हो सकते जब तक होज़े कौसर पर मेरे पास न पहुँच जाये।



यह हदीस अहलि सुन्नत की बहुतसी मशहूर किताबों में पायी जाती है। अल्लामा अमीनी ने इन किताबों का ज़िक्र अलग़दीर की तीसरी जिल्द में किया है।[1]



अहले सुन्नत के मशहूर मुफ़स्सिर फ़ख़रे राज़ी ने तफ़सीर कबीर में सूरए हम्द की तफ़सीर के तहत लिखा है कि “हज़रत अली अलैहिस्सलाम बिस्मिल्लाह को बलन्द आवाज़ से पढ़ते थे। और यह बात तवातुर से साबित है कि जो दीन में अली की इक़्तदा करता है वह हिदायत याफ़्ता है। और इसकी दलील पैगम्बर (स.) की यह हदीस है कि आपने फ़रमाया “अल्लाहुम्मा अदरिल हक़्क़ा मअ अलीयिन हैसु दार।” तर्जमा – ऐ अल्लाह तू हक़ को उधर मोड़ दे जिधर अली मुड़े।[2]



काबिले तवज्जोह है यह हदीस जो यह कह रही है कि अली की ज़ात हक़ का मरकज़ है



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2- पैमाने बरादरी


पैगम्बर (स.) के असहाब के एक मशहूर गिरोह ने इस हदीस को पैगम्बर (स.) नक़्ल किया है।



“ अख़ा रसूलुल्लाहि (स.) बैनः असहाबिहि फ़अख़ा बैना अबिबक्र व उमर , व फ़ुलानुन व फ़ुलानुन फ़जआ अली (रज़ियाल्लहु अन्हु) फ़क़ालः अख़ीतः बैनः असहाबिक व लम तुवाख़ बैनी व बैना अहद ? फ़क़ालः रसूलुल्लाहि (स.) अन्तः अख़ी फ़िद्दुनिया वल आख़िरति।”



तर्जमा- “पैगम्बर (स.) ने अपने असहाब के बीच भाई बन्दी का रिश्ता क़ाइम किया अबुबकर को उमर का भाई बनाया और इसी तरह सबको एक दूसरे का भाई बनाया । उसी वक़्त हज़रत अली अलैहिस्सलाम हज़र की ख़िदमत में तशरीफ़ लाये और अर्ज़ किया कि आपने सबके दरमियान बरादरी का रिश्ता क़ाइम करदिया लेकिन मुझे किसी का भाई नही बनाया। पैगम्बर (स.) ने फ़रमाया आप दुनिया और आख़िरत में मेरे भाई हैं।”



इसी से मिलता जुलता मज़मून अहले सुन्नत की किताबों में 49 जगहों पर ज़िक्र हुआ है।[3]



क्या हज़रत अली अलैहिस्सलाम और पैगम्बर (स.) के दरमियान बरादरी का रिश्ता इस बात की दलील नही है कि वह उम्मत में सबसे अफ़ज़लो आला हैं ? क्या अफ़ज़ल के होते हुए मफ़ज़ूल के पास जाना चाहिए?



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3-निजात का तन्हा ज़रिया


अबुज़र ने खाना ए काबा के दर को पकड़ कर कहा कि जो मुझे जानता है वह जानता है और जो नही जानता वह जान ले कि मैं अबुज़र हूँ मैंने पैगम्बर (स.) से सुना है कि उन्होनें फ़रमाया कि



“ मसलु अहलुबैती फ़ीकुम मस्लु सफ़ीनति नूह मन रकेबहा नजा व मन तख़ल्लफ़ा अन्हा ग़रेक़ः।”



“तुम्हारे दरमियान मेरे अहले बैत की मिसाल किश्तीय नूह जैसी हैं जो इस पर सवार होगा वह निजात पायेगा और जो इससे रूगरदानी करेगा वह हलाक होगा।[4]



जिस दिन तूफ़ाने नूह ने ज़मीन को अपनी गिरफ़्त में लिया था उस दिन नूह अलैहिस्सलाम की किश्ती के अलावा निजात का कोई दूसरा ज़रिया नही था। यहाँ तक कि वह ऊँचा पहाड़ भी जिसकी चौटी पर नूह (अ.) का बेटा बैठा हुआ था निजात न दे सका।



क्या पैगम्बर के फ़रमान के मुताबिक़ उनके बाद अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के दामन से वाबस्ता होने के अलावा निजात का कोई दूसरा रास्ता है ?



*** [1] इस हदीस को मुहम्मद बिन अबि बक्र व अबुज़र व अबु सईद ख़ुदरी व दूसरे लोगों ने पैगम्बर (स.) से नक़्ल किया है। (अल ग़दीर जिल्द 3)

[2] तफ़सीरे कबीर जिल्द 1/205

[3] अल्लामा अमीने अपनी किताब अलग़दीर की तीसरी जिल्द में इन पचास की पचास हदीसों का ज़िक्र उनके हवालों के साथ किया है।

[4] मसतदरके हाकिम जिल्द 2/150 हैदराबाद से छपी हुई। इसके अलावा अहले सुन्नत की कम से कम तीस मशहूर किताबों में इस हदीस को नक़्ल किया गया है।





गिरोहे मआरिफ़ व तहक़ीक़ाते इस्लामी क़ुम



रमज़ानुल मुबारक 1422 हिजरी



अनुवादक- सैय्यद क़मर ग़ाज़ी