हसन अलैहिस्सलाम की अहादीस |


इमाम हसन अलैहिस्सलाम की अहादीस

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की अहादीस
 
इमाम हसन अलैहिस्सलाम की अहादीस



भलाई वह है जिसे करने से पूर्व टाल-मटोल न की जाए और करने के बाद, उपकार न जताया जाए।



मोमिन व्यक्ति उस कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता जिसका उसे ज्ञान न हो और कभी भी अक्षमता का बहाना बना कर दूसरों के अधिकारों की पूर्ति से मुंह नहीं मोड़ता।



अपना ज्ञान दूसरों को दो और दूसरों का ज्ञान स्वयं प्राप्त करो।



आत्ममुग्धता से अधिक भयावह कोई एकांत नहीं।



अतीत से पाठ लो और बीते काल के लोगों की निशानियों से नसीहत।



सब से अधिक सुनने वाले कान वह हैं जो उपदेश व शिक्षाप्रद बातों पर ध्यान दें।



दूरदर्शिता यह है कि सदैव अवसर उपलब्ध होने की प्रतीक्षा में न रहो बल्कि अपनी ओर से सक्रियता दिखाओ।



तुमसे निकट वह है जो मित्रता द्वारा तुमसे निकट हुआ हो भले ही उससे तुम्हारी कोई रिश्तेदारी न हो।



जिस गुट ने भी एक दूसरे से परामर्श किया उसे वांछित परिणाम प्राप्त हुए।



अवसर बहुत तेज़ी से हाथ से निकल जाता है और बहुत कठिनाई से पुन: हाथ आता है।



हंसी-मज़ाक़, मनुष्य के वैभव को कम करता है तथा कम बातें करने वाले के वैभव में सदैव वृद्धि होती रहती है।



भलाई वह होती है जो बिना मांगे और बिना उपकार जताए की जाए।



भलाई वो है जिसके पहले आज, कल न किया जाए और उसके बाद किसी पर एहसन न जताया जाए।



अवसर तेज़ी से गुज़र जाता है और देर में हाथ लगता है।



ईश्वर ने रमज़ान के महीने को लोगों के लिए प्रतियोगिता का मैदान बनाया है जिसमें लोग ईश्वर के आज्ञापालन द्वारा उसे प्रसन्न करने के लिए प्रतियोगिता में भाग लेते हैं और कुछ लोग आगे निकल जाते हैं तो वह सफल रहते हैं और कुछ लोग सुस्ती करते हैं तो वह विफल रहते हैं।