मौलाना अली नक़ी ताबे सराह |


सैयद- उल-उलमा जनाब मौलाना अली नक़ी ताबे सराह
सैयद- उल-उलमा जनाब मौलाना अली नक़ी ताबे सराह
 





सैयद- उल-उलमा जनाब मौलाना अली नक़ी ताबे सराह

विलादत


सैयद- उल-उलमा जनाब मौलाना अली नक़ी ताबे सराह की विलादत सन् 1323 हिजरी क़मरी में 26 रजब उल मुरज्जब को लख़नऊ के मशहूर ख़ानदान ख़ानदाने इजतेहाद में हुई। आपके वालिद मुमताज़- उल -उलमा जनाब मौलना अबुल हसन साहिब क़िबला एक बलन्द दर्जा आलिमें दीन थे।

तालीम

सात साल की उम्र में अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रोज़ -ए- मुबारक पर मुक़द्दस आलिमें दीन जनाब सैयद मुहम्मद अली शाह अब्दुल अज़ीमी ने आपकी रस्मे बिस्मिल्लाह अंजाम दी और वहीं से आपकी इब्तेदाई तालीम का आग़ाज़ हुआ। जब आप नौ साल के हुए, तो आपके वालिदे मोहतरम नजफ़े अशरफ़ से दर्ज -ए- इजतेहाद पर फ़ाइज़ हो कर लख़नऊ तशरीफ़ ले आये और आपको अपने वालिद के साथ हिन्दुस्तान लौटना पड़ा। हिन्दुस्तान आने के बाद इब्तेदाई तालीम अपने वालिद जनाब मुमताज़ -उल- उलमा से हासिल की। अरबी अदब सीखने के लिए आपने जनाब मुफ़्ती मुहम्मद अली साहिब क़िबला के सामने ज़ानू -ए- अदब तै किये। हिन्दुस्तान में आपने सुलतान -उल- मदारिस और मदरस -ए - नाज़मिया में तालीम हासिल करते हुए फ़ाज़िल की सनद हासिल की।

इराक़ का सफ़र

सैयद उल उलमा तकमीले इल्म के लिए सन् 1345 हिजरी क़मरी में इराक़ तशरीफ़ ले गये। होज -ए- इल्मिया नजफ़ में पाँच साल तालीम हासिल करने के बाद उस ज़माने के तीन अज़ीम मुजतहिदों यानी आयतुल्लाहिल उज़मा अबुल हसन इस्फ़हानी, आयतुल्लाहिल उज़मा नायनी और आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद ज़िया इराक़ी से इजाज़ -ए- इजतेहाद हासिल कर के हिन्दुस्तान तशरीफ़ लाये।

कुरआन का तर्जमा व तफ़्सीर

हिन्दुस्तान तशरीफ़ लेने के बाद आपने यहाँ के शियों की ज़रूरतों के तहत इस्लामी तालीमात के असली महवर क़ुरआने करीम और इससे मुताल्लिक़ उलूम पर काम करने का इरादा किया। इस नेक काम में आपकी तौफ़ीक़ात में रोज़ बरोज़ इअज़ाफ़ा होता रहा और नतीजतन आपने क़ुरआने करीम का उर्दू ज़बान में तर्जमा किया और साथ ही साथ सात जिल्दों में क़ुरआने करीम की तफ़्सीर भी लिखी। यह तफ़्सीर उर्दू ज़बान में लिखी जाने वाली तफ़्सीरों में इम्तियाज़ी मक़ाम रखती है। इसके अलावा आपने उर्दू ज़बान में उलूमे क़ुरआन से मुतल्लिक़ कुछ किताबें भी लिखी हैं। जिनमें क़ुरआने करीम के बैनुल अक़वामी इरशादात, क़ुरआने मजीद के अंदाज़े गुफ़तुगू में मेयारे रवादारी और तहरीफ़े क़ुरआन की हक़ीक़त बहुत मशहूर किताबें हुईं।