इस्लाम मानव जीवन को चलाया करता है |


इस्लाम मानव जीवन को चलाया करता है
इस्लाम मानव जीवन को चलाया करता है
 
इस्लाम मानव जीवन को चलाया करता है

इस के पूर्व कथा हूई है, कि मानव जीवन को चलाने के लिए ख़ूबसूरत व उत्तम क़ानून पवित्र इस्लाम-धर्म में उपस्थित है। जो बयान हूआ है. कि इस्लाम एक ऐसा उत्तम व ख़ूबसूरत क़ानून है, जो आजके पृथ्वी में किसी समाज, हत्ता किसी प्रकार धर्म से उधारण दिया नहीं जा सकता और ना मिलता है।
इस्लामी समाज बनाना, यानी महा इश्वर पर विश्वास का एक उत्तम ज़रीया है, और मानव जीवन का अल्लाह पर विश्वास का ताआदुल बरक़रार रख़ता है। चीज़ से इंसान इस्लामी समाज और उस के क़वानीन को ग्रहण करके अपने क़दम को अग्रसर कर सकता है. हलाकि इस्लामी जैसा समाज गठन के लिए, मानव जीवन का क़ानून इस सिल्सिले से समाज से बहुत दूर है।
इस्लामी समाज में मानव जीवन के लिए एक ख़ूबसूरत व उत्तम ईमानी पाया जाता है, और इस में किसी प्रकार कि दुःख़, कष्ट, व समस्सया उपस्थित नहीं है। लेकिन इस्लामी समाज में उठा-बैठा करने वालों के लिए एक रिश्तेदरी मौहब्बत व भाई चारह का क़ानून पाया जाता है और इस क़ानून के छाए में जीवन बसर करना समस्त प्रकार कि मसिबत और दुःख़ कष्ट को भूला देता है।
इस्लामी देशों में जो काम बयान करने का उपयुक्त है उस का सूचीपत्र यह है किः ज्ञान व तालीम बिस्तार कराना, तिजारत व कम्पनी ख़ोलना, किसानों के कामों में सहायता करना, तिजारत और हुकूमती पैमाने का फैदा वगैरह......।
इस्लामी देशों में अत्याचारी कि अत्याचार, व पार्टिबाज़ी, हैरानी, और नियम पद्धति के ख़िलाफ वर्ज़ि, और ग़रीबों की कोई सम्स्या उपस्थित नहीं है।
हाँ अगर मुसलिम क़ौम अपने दर्मियान भाई भ्रता के नियम से ज़िन्दगी बसर करने के लिए चेष्टा करे तो उन जनता के लिए एक मोती ज़िन्दगी अपेक्षा करेगी। लेकिन इस ज़िन्दगी में शर्त है कि पवित्र कुरआन व रसूल (स0) और मासूमीन (अ0) का बताया हूआ निर्देश पर अमल करना बहुत सख़्त ज़रूरी व अवशक है। और इस के साथ साथ इस्लामी एकत्रित व भाईचारह, आज़ादी व इस्लाम के विभिन्न प्रकार क़ानून के ऊपर अमल करना अवशक है। प्रत्येक मूसलमान पर दायित्व है कि पृथ्वी में इस्लामी राष्ट्र सृष्ट करने के लिए इस्लामी क़वानीन के मुताविक़ समाज बनाना, और सब समय जान व माल देके चेष्टा करना. और आल्लाह से तौफ़िक़ तल्ब करना (ताकि हम सब को उसी तरह जीवन बसर करने का तौफ़िक़ इनाएत फ़रमाएं।
अमीन या रब्बल आलामिन।