अशाइरा |


अशाइरा
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(1)

अशाइरा, अबुल हसन अशअरी (260-324 हिजरी) के मानने वालों को कहते हैं। अबुल हसन अशअरी ने अक़्ल (बुद्धी) से काम लेने में तफरीत से काम लेते हुए दरमियान का



एक तीसरा रास्ता चुना है। दूसरी सदी हिजरी के दौरान इन दोनों फिकरी मकतबों नें बहुत ज़्यादा शोहरत हासिल की।



मोअतज़ला अक़ाइद के लिए अक़्ल को एक मुस्तक़िल माखज़ (स्त्रोत) समझते थे और इसके ज़रिए इस्लाम की रक्षा करने की ताकीद (पुष्टि) करते थे और इसको



प्रयोग करने में इफरात से काम लेते थे। दूसरी तरफ अहले हदीस, अक़्ल से हर तरह के काम को मना करते थे और क़ुरआन व सुन्नत के ज़ाहिर (प्रकट) को बग़ैर किसी



फिकरी तहलील के उसके दीनी तालीमात में मिलाक व मेयार के उनवान से क़बूल करते थे। अशअरी मज़हब नें चौथी सदी के शुरूअ में अहले हदीस के अक़ाइद से रक्षा और अमली



तौर पर इन दोनों मकतबों की तादील के उनवान से अक़्ल और नक़्ल के मुआफिक़ एक मोअतदिल रास्ता इख्तियार किया।



अबुल हसन अली इब्ने इस्माईल अशअरी अपनी जवानी में मोअतज़ला के अक़ाइद से वाबस्ता थे उन्होंने उनके उसूले अक़ाइद को उस वक़्त के



मशहूर उस्ताद अबू अली जुब्बाई (देहान्त 33 हि.) से हासिल किए और चालीस साल की उम्र तक



मोअतज़ला का समर्थन करते रहे और इसी विषय (Subject) से संबन्धित बहुत सी किताबें भी लिखीं। इसी दौरान उन्होंने इस मज़हब से दूरी कर ली और



मोअतज़ला के मुक़ाबिल में अहले हदीस के मुताबिक़ कुछ नज़रियात (दृष्टिकोण) पेश किए। अशअरी एक तरफ तो दूसरों के माखज़ (स्त्रोत) को किताब व सुन्नत बताते थे



और इस वजह से मोअतज़ला का विरोध करते थे और अहले हदीस हो गए। लेकिन अस्हाबे हदीस के बर खिलाफ दीनी अक़ाइद से दिफा



और उसको साबित करने के लिए बहस व इस्तेदलाल को जाएज़ समझते थे और अमली तौर पर इसका उपयोग करते थे।



इसी ग़रज़ से उन्होंने एक किताब (रिसालतुन फी इस्तेहसानिल ख़ौज़ फी इल्मिल कलाम) लिखी और इसमें इल्मे कलाम का समर्थन किया।



अशअरी नें नक़्ल को असालत देने के साथ साथ अक़्ल को साबित करने और दिफा करने के लिए क़बूल कर लिया।



वह आरंभ में मोअतज़ला के नज़रियात को बातिल (भंग) करने की ज़िम्मेदारी समझते थे लेकिन उन्होंने मोअतज़ला के अक़ाइद से जंग करते हुए अहले हदीस के अक़्ली



तरीक़े को साबित किया और उनके नज़रियात (दृष्टिकोण) को एक हद तक मोअतज़ला के नज़रियात (दृष्टिकोण) से नज़दीक कर दिया।

 

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(2)

अशअरी के नज़रियात (दृष्टिकोण): इस जगह पर कोशिश करेंगे कि अशअरी के तरीक़े के नतीजे को उनके कुछ अक़ाइद में ज़ाहिर (प्रकट) करें।



इस वजह से उसके अक़ीदे को अस्हाबे हदीस और मोअतज़ला के अक़ाइद को इजमाल (संक्षिप्त) के साथ एक दूसरे से मुक़ाबला करेंगे।



(1)सिफाते ख़बरी: इल्मे कलाम में कभी कभी सिफाते इलाही को सिफाते ज़ातिया और सिफाते ख़बरिया में बाँटते हैं।



सिफाते ज़ातिया से मुराद वह सिफात हैं जो आयात व रिवायात में बयान हुई हैं और अक़्ल खुद व खुद इन सिफात को खुदा के लिए साबित करती है



जैसे खुदा के लिए हाथ, पैर और चेहरे का होना, इस तरह की सिफात के मुतअल्लिक़ मुतकल्लेमीन के दरमियान इख्तिलाफ (विभेद) है।



अहले हदीस का एक गुरूप जिसको मुशब्बहा हशविया कहते हैं, यह सिफाते ख़बरिया को तशबीह (उपमा) के साथ खुदा वंदे आलम के लिए साबित (सिद्ध) करते हैं।



यह लोग इस बात के मोअतक़िद हैं कि खुदा में सिफाते ख़बरिया उसी तरह पाई जाती है जिस तरह मखलूक़ात में पाई जाती हैं



और इस जहत से ख़ालिक़ (खुदा) और मखलूक़ के दरमियान बहुत ज़्यादा शबाहत पाई जाती है।



शहरिस्तानी नें इस गुरुप के कुछ लोगों से नक़्ल किया है कि उनका अक़ीदा यह है कि खुदा को लम्स (स्पर्श) किया जा सकता है और उससे हाथ और गले मिला जा सकता है।



अहले हदीस में से कुछ लोग सिफाते ख़बरिया के मुतअल्लिक़ तफवीज़ (प्रदान) के मोअतक़िद हैं। यह लोग सिफाते ख़बरिया को खुदा से मंसूब करते हैं और उन अलफाज़ (Words)



के मफहूम और मफाद के सम्बंध में हर तरह का नज़रिया (दृष्टिकोण) पेश करने से दूरी करते हैं और उसके मअना (Meaning) को खुदा पर छोड़ देते हैं।



मालिक इब्ने अनस का खुदा के आसमान (अर्श) पर होने की कैफियत के मुतअल्लिक़ सवाल के जवाब से उनका नज़रिया (दृष्टिकोण) मालूम हो जाता है।



लेकिन मोअतज़ला, खुदा को मख़लूक़ात से मुशाबेह होने से पाक और दूर समझते हैं और खुदा के हाथ और पैर रखने वाली सिफात को जाइज़ नही समझते हैं।



दूसरी तरफ क़ुरआन और रिवायात में इस तरह की सिफात की खुदा से निस्बत दी गई है।



मोअतज़ला नें इस मुश्किल को हल करने के लिए सिफाते ख़बरिया की तौजीह (स्पष्टीकरण) व तावील (अर्थापन) करना आरंभ कर दिया और यदूल्लाह (खुदा के हाथ)



की “ खुदा की क़ुदरत ” से ताबीर व तफसीर करने लगे।



अशअरी , सिफाते ख़बरिया को साबित (सिद्ध) करने में एक तरफ तो असहाब हदीस के नज़रिए को क़बूल कर लिया और



दूसरी तरफ “ बिला तशबीह ” और “ बिला तकलीफ ” की क़ैद को इसमें बढ़ा दिया।



वह कहते हैं :“ यक़ीनन खुदा के दो हाथ हैं लेकिन खुदा के हाथ की कोई कैफियत नहीं है जैसा कि खुदा फरमाता हैः हल यदाहो मबसूततान –सूरए माइदाः64 ” ।

 

अशाइरा
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(3)

(2)जब्र और इख्तियारः अहले हदीस ने खुदा की कज़ा और कद्र पर एतिक़ाद रखने और अमली तौर पर इस एतिक़ाद को इंसान के इख्तियार के साथ जमा



करने की ताक़त न रखने की वजह से वह इंसान के लिए उसके अफआल में कोई किरदार अदा नही कर सके, इस वजह से वह नज़रिए जब्र में गिरफ्तार हो गए।



यह बात इब्ने हम्बल के एतिक़ादनामे में ज़िक्र हुए एतिक़ाद से पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। जबकि मोअतज़ला इंसान के इख्तियारी अफआल में उसकी मुतलक़ आज़ादी के क़ाइल हैं



और कज़ा व कद्र और खुदा के इरादे के लिए इस तरह के अफआल में किसी नज़रिए के क़ाइल नही हैं।



अशअरी का नज़रिया यह था कि न सिर्फ कज़ा और कद्रे इलाही आम है बल्कि इंसान के इख्तियारी अफआल को भी खुदा ईजाद और खल्क़ करता है



दूसरी तरफ उसने कोशिश की कि इंसान के इख्तियारी अफआल के लिए कोई किरदार पेश करे। उन्होनें इस किरदार को नज़रिए कस्ब के क़ालिब में बयान किया।



अशअरी का यह नज़रिया बहुत ही अहम और पेचीदा है इस लिए हम इसको यहाँ तफसील (विस्तार) से बयान करते हैं –



कस्ब एक क़ुरआनी शब्द है और विभिन्न आयात में इस शब्द और इससे बनने वाली दूसरी चीज़ों (मुशतक़्क़ात) को इंसान की तरफ निस्बत दी गई है।



कुछ मुतकल्लेमीन जैसे अशअरी नें अपने नज़रियात को बयान करने के लिए इस शब्द से फायदा उठाया है।



उन्होनें कस्ब के विशेष अर्थ बयान करने के बीच इसको अपने नज़रिए जब्र और इख्तियार और इंसान के इख्तियारी अफआल की तोसीफ पर मिलाक क़रार दिया है।



अगरचे अशअरी से पहले दूसरे मुतकल्लेमीन नें भी इससे संबन्धित बहुत कुछ बयान किया है। लेकिन अशअरी के बाद, कस्ब का शब्द उनके नाम से इस तरह जुड़ गया है कि



जब भी कस्ब या नज़रिए कस्ब की तरफ इशारा होता है तो बे-इख्तियार अशअरी का नाम ज़बान पर आ जाता है।



उनके बाद अशअरी मसलक के मुतकल्लेमीन ने अशअरी के बयान किए हुए नज़रिए से इख्तिलाफ के साथ अपनी खास तफसीर को बयान किया है।



यहां पर हम नज़रिए कस्ब को अशअरी की तफसीर के साथ बयान करेंगे। उनके नज़रियात यह हैं :



A.क़ुदरत की दो क़िस्में हैं: एक क़ुदरते क़दीम (पुरानी क़ुदरत) जो खुदा से मखसूस (विशेष) है और फेअल के खल्क़ और ईजाद करने में प्रभावशाली है।



औऱ दूसरी क़िस्म क़ुदरते हादिस है जो फेअल को ईजाद करने में प्रभावशाली नही है और इसका फायदा यह है कि साहिबे क़ुदरत अपने अंदर आज़ादी और इख्तियार का एहसास करता है



और गुमान करता है कि वह किसी काम को अंजाम देने की क़ुदरत रखता है।



B.इंसान का फेअल, खुदा की मख़लूक़ है: अशअरी के लिए यह एक क़ाइदए कुल्ली है कि खुदा के इलावा कोई खालिक़ नही है सभी चीज़ें,



उनमें से इंसान के तमाम अफआल खुदा की मखलूक़ हैं। वह स्पष्ट करते हैं कि अफआल का हक़ीक़ी (वास्तविक) फाएल (कारक) खुदा है।



क़्यों कि खिलक़त (जन्म) में सिर्फ क़ुदरते क़दीम मुअस्सिर (प्रभावशाली) है और यह क़ुदरत केवल खुदा के लिए है।



C.इंसान का किरदार, फेअल को कस्ब करना है खुदा इंसान के अफआल को खल्क़ करता है और इंसान खुदा के खल्क़ किए हुए अफआल हासिल करता है।



D.कस्ब यानि खलक़े फेअल का इंसान में क़ुदरते हादिस के खल्क़ होने के साथ मक़ारिन होना। अशअरी खुद लिखते हैं:



मेरे नज़दीक हक़ीक़त यह है कि इक्तिसाब और कस्ब करने के मानी फेअल का क़ूव्वते हादिस के साथ और एक ही समय वाक़ेअ होना है।



इस लिए फेअल को कस्ब करने वाला वह है जिसमें फेअल क़ुदरत (हादिस) के साथ ईजाद हुआ हो। मिसाल के तौर पर जब हम कहते हैं कि कोई रास्ता चल रहा है



या वह रास्ता चलने को कस्ब कर रहा है, यानि खुदा इस शख्स में रास्ता चलने को ईजाद करने के साथ साथ उसके अंदर क़ुदरते हादिस भी ईजाद कर रहा है



जिसके ज़रिए इंसान यह एहसास करे कि वह अपने फेअल को अपने इख्तियार से अंजाम दे रहा है।



E.इस नज़रिए में फेअल इख्तियारी और ग़ैर इख्तियारी में फर्क़ यह है कि फेअल इख्तियारी में चूँकि फेअल अंजाम देते वक़्त इंसान में क़ुदरत हादिस होती है तो



वह आज़ादी का एहसास करता है लेकिन ग़ैर इख्तियारी फेअल में चूँकि इसमें ऐसी क़ुदरत नहीं है वह जब्र और ज़रूरत का एहसास करता है।